शुक्रवारवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
विरोध की भाषा मात्र इक हुॅंकार नहीं होती,
यह महज़ चीख-पुकार या तीखी धार नहीं होती।
यह तो उस गहरी खामोशी का बहता हुआ ज़ोर है,
दमघोंटू सन्नाटे की छाती को चीरता शोर है।
जब-जब अन्याय की दीवारें बहुत ऊँची उठती हैं,
तब-तब इस भाषा की गूँज हवाओं में उठती हैं।
यह नफ़रत का पैगाम नहीं, बस हक की एक पुकार है,
झुकने से साफ़ इंकार करती, सच की अपनी ढाल है।
कभी सड़कों पर उमड़े जनसैलाब की ललकार बनती है,
कभी बंद कमरों में उकेरी गई कलम की धार बनती है।
यह उबलता हुआ रोष भी है, और सब्र का बाँध भी,
अँधेरे को आँख दिखाने वाला, विचारों का आफ़ताब भी।
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आज की रचनाऍं-
मंगल-गीत
पंछी कहते नभ छोटा है,
यदि विश्वास तुम्हारे संग।
साहस के दो पंख लगाओ,
जीत सुनिश्चित हर एक जंग।
धरती कहती बीज बनो तुम,
जिससे हरियाली मुस्काए।
प्रेम, दया, सेवा के अंकुर,
हर मानव के मन उपजाए।
दर्द
किस दर्द में कितना दहाड़ना है
दर्द कौन सा वाला है
दर्द फायदा देगा या नुकसान
ये समझ पाना आसान नहीं।
यही हम अलग हो जाते हैं।
हमारी जात भी
नम ऑंखों के प्रश्न
झाँका नम आँखों में
वे एक पत्नी की आँखें थी
करके समर्पित जीवन अपना
धारण कर कुछ चिह्न
बनी थी कन्या से वो नारी
बदले में जो कुछ पाया,
अपने घर के तानों से वो
कभी मुक्त न हो पाई
फिर भी
तन मन से रही समर्पित
नम आँखें कहती हैं
मुझे बता दो कोई
मेरा अपना अस्तित्व कहाँ हैं?
मॉं और मानव
ओर हो अपना प्रयाण
जानें उन्हें और पाएँ वरदान
मानव ह्रदय की
यही तो उपलब्धि है
अंतर में अभाव नहीं
पूर्ण समृद्धि है !
गधा आगे क्यों निकला?
लोग हैरान थे— "भला गधा घोड़ों से कैसे जीत पाएगा?"
रेस शुरू हुई और कुछ देर बाद समाप्त भी हो गई।
नतीजा आया तो सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सबसे आगे गधा था।
लोगों ने उत्सुकता से पूछा, "इतने तेज़-तर्रार घोड़ों के बीच तुम जीत कैसे गए?"
गधा मुस्कुराया और बोला—
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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जवाब देंहटाएंऔर गदहा जीत गया
बेहतरीन प्रस्तुति
आभार
वंदन