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रविवार, 15 फ़रवरी 2026

4654 लोगों का बसियाया सा चेहरा मुझे हारे हुए जुआरी सा लगता है

 सादर अभिवादन 
लोगों का बसियाया सा चेहरा
मुझे हारे हुए जुआरी सा लगता है
आज रवींद्र भाई नही है
भूल गए हों शायद

रचनाएं देखें



तुम जैसे...
बंद पलकों की खिड़की पर
डोलता जुगनू,
अंधेरे की उंगली में जड़ा
 नीला रत्न,
अथाह जल के बीच
घड़ियाल के पीठ पर बैठकर
उकेरे गये सपने,
अंतिम इच्छा का उत्सव। 



लड़कों की जेब में
तितिर-बितिर रखा 
लड़कियों की चुन्नी में
करीने से बंधा 

दूल्हे की पगड़ी में 
कलगी के साथ खुसा
सुहागन की
काली मोतियों के बीच में फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है 





एक रात, जब पहरेदार थक जाते हैं
और ताले अपनी चाबियाँ भूल जाते हैं,
धरती के भीतर
एक हल्की-सी खरोंच होती है—
जैसे इतिहास ने करवट ली हो।

वहीं से एक प्रश्न अंकुरित होता है—
बिना अनुमति, बिना आदेश।





इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,
उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने। 

न नींद आती है, न चैन पड़ता है,
किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने? 



हाथों की लकीरों सा पाला था जिन्हें,
आज वे ही हाथ अनजानी राहों पर चल पड़े।
जिनकी मुस्कान के लिए बेच दी थी अपनी रातें,
आज वे ही अपनी दुनिया के चकाचौंध में ढल पड़े।



प्रेम 
महज एक इन्द्रजाल  
एक कुहासा  
जिसमें विमुग्ध पथिक 
विलुप्त हुआ अपने आप से
खिंचा चला जाता है कहीं दू...र 
अनजान ,अपना सब कुछ छिन जाने की ,
एक साजिश से  
एक
स्कैम है प्रेम ।





समय बहुत कठिन था
पर उतना भी बुरा नहीं था
कि मैं बच नहीं सकती थी
मुझे तो मेरे  ह्रदय के गर्भ में जन्मे
प्रेम ने मार डाला जो तुम्हारे लिए था  |




हर एक रंग होता है प्यार ,यार किससे कहें
सभी तो होते हैं तलबगार ,यार किससे कहें

बहारें देख, खिलते हैं मन,और गुल गुलिस्तां मे
सभी होते हैं,बागों मे शुमार ,यार किससे कहें


आज का अंक भी
कुछ भारी हो गया है
सादर वंदन

रविवार, 25 जनवरी 2026

4633 मजबूत मजबूर मशहूर और मगरूर किसका कौन सा दिन है

 सादर अभिवादन 
सप्ताह का एक दिन है, जो शनिवार के बाद और सोमवार से पहले आता है,   और यह सूर्य देव (सूर्य) को समर्पित एक शुभ और महत्वपूर्ण दिन है, 

भाई रवींद्र जी को आना था
खैर कोई बात नहीं
आप तो हैं..चलिए चलते हैं




आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती
ठूंठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती
लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  ।






सारा   बोझा   बंद   आँखों   में   उतारकर
झील   के    उस   किनारे   का   इंतजार
तरंग    उछलते   कंकड   ढूँढे    न    अब
कोई   प्रश्न   नाही   उत्तर   की    दरकार 
मेरा   होना   भी  एक   भूल   लागे   जब
नयन    समक्ष   दर्पण   मन   का   निहारे






सबसे पीड़ित व्यक्ति 
अपनी पीड़ा की बात नहीं सुनेगा 
उसके सामने दूसरे की पीड़ा को 
मनोरंजन बनाकर परोस दिया जायेगा  
वो अपनी भूखी अंतड़ियों को 
बांधकर
हिंसा के दृश्यों में उगाये गए 
आनंद के सागर में गोते लगाएगा।   





कूल-किनारे हरियाली हो ।
अन्तर कोश नहीं खाली हो ।
नदिया का अविरल प्रवाह ,
निर्मल , कल कल स्वर दे
मन जगमग जग करदे ।





गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया—
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?
क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?





मजबूरियाँ
मगर
नजर आई हैं
समझ में भी आई हैं

कुछ
करने के लिये
सच में
चाहिये होता है
एक बहुत बड़ा
विशाल कलेजा

वो कभी ना
हो पाया है
ना ही लगता है
कभी हो पायेगा
जो कर पाये
अपने आसपास
के झूठों से
सच में प्रतिकार  



आज बस
सादर वंदन

रविवार, 2 नवंबर 2025

4559 रज-कण पर जल-कण हो बरसी नवजीवन-अंकुर बन निकली

 सादर नमस्कार



राज्योत्सव चालू आहे
प्रधान मंत्री माननीय मोदी जी
का आगमन हुआ था कल
मन प्रफुल्लित हुआ

और आज से ही चातुर्मास का
समापन हो रहा है

रचनाए देखिए ...

आज पढ़िए बुकमार्क कविताएं




जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।

सरल तामरस गर्भ विभा पर,
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर,
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे,
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए,
समझ नीड़ निज प्यारा।।






मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार, बनी अविरल,

रज-कण पर जल-कण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना,
पद-चिह्न न दे जाता जाना,

सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली!





है अमानिशा; उगलता गगन घन अंधकार;
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार;

अप्रतिहत गरज रहा पीछे अंबुधि विशाल;
भूधर ज्यों ध्यान-मग्न; केवल जलती मशाल।

स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय,
रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय;



आज महामूर्ख सम्मलेन अपनी पराकाष्ठा पर था।  सम्मलेन में  मौजूद मूर्खो की संख्या देखकर हम सम्मेलन के मुरीद हो गए. हमें  एहसास हुआ कि हम मूर्खानगरी के नागरिक है , दुनिया ही मूर्खो की है तो हम कहाँ से पृथक हुए।  खरबूजे को देख खरबूजा ही रंग बदलता है , किन्तु यहाँ हर रंग अपने सिर पर मूर्खो का ताज सजाने को आमादा है।




भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो
पंछियों की तरह चहचहाते रहो

रोने धोने को ना, है ये जीवन मिला
ना किसी से रखो कोई शिकवा गिला
प्रेम का रस सभी को पिलाते रहो
भुनभुनाओ नहीं ,गुनगुनाते रहो





वह व्यस्त था
अपने कारोबार में
वह खुश था
अपने परिवार में
वह रात को देर से सोया था
सुमधुर सपने में खोया था
अचानक वह झिझोड़कर उठाया गया
और उसे बताया गया
‘‘सोओ मत’’  
‘‘अगले चौराहे पर तुम्हारा धर्म खतरे में है’’




आज बस
सादर वंदंन

रविवार, 12 अक्टूबर 2025

4538.... उबड़-खाबड़ सतह पर कैसा ईश अनुग्रह है

 सादर अभिवादन

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

4531 ...अगर मैं कुत्ता होता तो.. क्या वफादार होता ?

 सादर नमस्कार

रविवार को फिर
ज़िन्दगी है जब तक तू जीवित है फ़िज़ा
मरकर भी क्या कोई जी सका है यहाँ !!

चलिए चलें





मधुर तृप्ति का भाव जगा जो
अतृप्ति का भी घाव लगा जो,
चैन और बेचैनी उर की
तेरे चरणों पर रखते हैं !

शांति औ' आनंद की मूरत
देवी ! तू अज्ञान को हरे,
तू ही भरे रंग माया के
हर वर माथे पर धरते हैं !






निर्वस्त्र हुए वृक्षों पर
पक्षियों के रहस्य और
हैं धमनियों के जाल;


टूटे,झरे,निराशा के ठूंठ पर
नन्हीं,कोमल,आशाओं से भरी
पत्ती मुस्कुराती है;
नारंगी भोर कुलांचे भरकर
टहक सांझ में बदल जाती है।





पुलकों  में  समाविष्ट   मन  की   हलचल  का   तार
अंतर्मन  को   जो   संदेशा  भेजता  बार  - बार
परिधि  में  बंध   एक   फेनिल  सा  उजास
ज्यों - ज्यों  मथ ता  जाता  दूषित  अंधियारा
मिट  गह्वर  में  भी  प्रकाश  तब  नजर  आता
अभिमान  में  रत  भूला  फिर  वापस  अपने  घर  को  आता




कुत्ता होता मैं
धोबी का छोड़ कर किसी का भी होता
कहते हैं कुत्ता वफादार होता है
अगर मैं कुत्ता होता तो..
क्या वफादार होता ?
ये अलग प्रश्न है





कल रावण मेरे सपने में आया
परेशान था और झल्लाया
बोले में रावण हूं
दुनिया में नंबर वन हूं
मेरे पास अतुलित दौलत है
बाहुबली हूं ,मुझ में ताकत है
कोई मुझसे मेरे हथियारों के कारण डरता है 
कोई मुझसे मेरे स्वर्ण भंडारों के कारण डरता है






खेल ज़िंदगी के तुम खेलते रहो यारों
हार जीत कोई भी आखिरी नहीं होती

बस कल फिर

रविवार, 7 सितंबर 2025

4504 ..दिन ढलते-ढलते ग्रहण दिखाई पड़ने लगेगा

 सादर अभिवादन

रविवार, 6 अप्रैल 2025

4450 ...चैत्रे नवम्यां प्राक् पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ

 सादर अभिवादन


रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है 
जो अप्रैल-मई में आता है। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार 
इस दिन मर्यादा-पुरूषोत्तम भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था।



चैत्रे नवम्यां प्राक् पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ ।
उदये गुरुगौरांश्चोः स्वोच्चस्थे ग्रहपञ्चके ॥
मेषं पूषणि सम्प्राप्ते लग्ने कर्कटकाह्वये ।
आविरसीत्सकलया कौसल्यायां परः पुमान् ॥

देखें रचनाएं




उसने खुशी खुशी यह बात अपने पिताजी को बताई। वे प्रसन्न हुए और कहा जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम एकबार भी क्रोधित नहीं हुए, ठोकीं हुई कील मे से एक कील निकाल लेना।






खुली नहीं खिड़की
दरवाजे बन्द है
जीवन में बाधाएं
किसको पसन्द है
कालिख पुते चेहरे
हुए अब गहरे है
गद्य हुए मुखरित
छंदों पर प्रतिबंध है






देश छुपे गद्दार को, अब लो सब पहचान।
जो हुआ नहीं देश का, क्या तेरा है जान।।

भारत माता कह रही,  कर लो अब संकल्प।
राष्ट्र बचा लो साथ मिल,  वक्त बचा है अल्प।।





है प्रीत जहाँ की रीत सदा,
मैं गीत वहाँ के गाता हूँ।
भारत का रहने वाला हूँ,
भारत की बात सुनाता हूँ।






सफेद जो गंदा होता है
जल्द , आसानी से
पहने हुए लोग
गले मिलते दिखाई दिए
किसी की छाती पर
गंदगी नहीं दिखी



फिर मिलते हैं
वंदन

रविवार, 24 नवंबर 2024

4317 ..."निन्दक नियरे राखिए" यानी कि शादी अवश्य कीजिए

 सादर अभिवादन

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