सादर नमस्कार
राज्योत्सव चालू आहे
प्रधान मंत्री माननीय मोदी जी
का आगमन हुआ था कल
मन प्रफुल्लित हुआ
और आज से ही चातुर्मास का
समापन हो रहा है
रचनाए देखिए ...
आज पढ़िए बुकमार्क कविताएं
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरल तामरस गर्भ विभा पर,
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर,
मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे,
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए,
समझ नीड़ निज प्यारा।।
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार, बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना,
पद-चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली!
है अमानिशा; उगलता गगन घन अंधकार;
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार;
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अंबुधि विशाल;
भूधर ज्यों ध्यान-मग्न; केवल जलती मशाल।
स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय,
रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय;
आज महामूर्ख सम्मलेन अपनी पराकाष्ठा पर था। सम्मलेन में मौजूद मूर्खो की संख्या देखकर हम सम्मेलन के मुरीद हो गए. हमें एहसास हुआ कि हम मूर्खानगरी के नागरिक है , दुनिया ही मूर्खो की है तो हम कहाँ से पृथक हुए। खरबूजे को देख खरबूजा ही रंग बदलता है , किन्तु यहाँ हर रंग अपने सिर पर मूर्खो का ताज सजाने को आमादा है।
भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो
पंछियों की तरह चहचहाते रहो
रोने धोने को ना, है ये जीवन मिला
ना किसी से रखो कोई शिकवा गिला
प्रेम का रस सभी को पिलाते रहो
भुनभुनाओ नहीं ,गुनगुनाते रहो
वह व्यस्त था
अपने कारोबार में
वह खुश था
अपने परिवार में
वह रात को देर से सोया था
सुमधुर सपने में खोया था
अचानक वह झिझोड़कर उठाया गया
और उसे बताया गया
‘‘सोओ मत’’
‘‘अगले चौराहे पर तुम्हारा धर्म खतरे में है’’
आज बस
सादर वंदंन
