सादर अभिवादन
सप्ताह का एक दिन है,
जो शनिवार के बाद और सोमवार से पहले आता है,
और यह सूर्य देव (सूर्य) को समर्पित एक शुभ और महत्वपूर्ण दिन है,
भाई रवींद्र जी को आना था
खैर कोई बात नहीं
आप तो हैं..चलिए चलते हैं
आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती
ठूंठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती
लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज ।
सारा बोझा बंद आँखों में उतारकर
झील के उस किनारे का इंतजार
तरंग उछलते कंकड ढूँढे न अब
कोई प्रश्न नाही उत्तर की दरकार
मेरा होना भी एक भूल लागे जब
नयन समक्ष दर्पण मन का निहारे
सबसे पीड़ित व्यक्ति
अपनी पीड़ा की बात नहीं सुनेगा
उसके सामने दूसरे की पीड़ा को
मनोरंजन बनाकर परोस दिया जायेगा
वो अपनी भूखी अंतड़ियों को
बांधकर
हिंसा के दृश्यों में उगाये गए
आनंद के सागर में गोते लगाएगा।
कूल-किनारे हरियाली हो ।
अन्तर कोश नहीं खाली हो ।
नदिया का अविरल प्रवाह ,
निर्मल , कल कल स्वर दे
मन जगमग जग करदे ।
गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।
क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया—
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?
क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?
क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?
मजबूरियाँ
मगर
नजर आई हैं
समझ में भी आई हैं
कुछ
करने के लिये
सच में
चाहिये होता है
एक बहुत बड़ा
विशाल कलेजा
वो कभी ना
हो पाया है
ना ही लगता है
कभी हो पायेगा
जो कर पाये
अपने आसपास
के झूठों से
सच में प्रतिकार
आज बस
सादर वंदन
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