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शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

4624....पूरे शहर को रौशन करने की ज़िद में

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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स्वामी विवेकानंद जी ने कहा एक नायक बनो और सदैव यह कहो “मुझे कोई डर नहीं है”।

एमर्सन ने कहा "डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है"।

ओशो ने कहा, उस तरह से मत चलिए जिस तरह से डर आपको चलाये, बल्कि उस तरह चलिए जिस तरह ख़ुशी आपको चलाये, उस तरह चलिए जिस तरह प्रेम आपको चलाये।

गाँधी जी ने कहा हमारा वास्तविक शत्रु हमारा डर है।

मेरी समझ से परिस्थितियों के अनुसार भय के अनेक रूप है किंतु यह हम पर निर्भर है कि भय का सामना किस प्रकार किया जाये। विशेषकर जिनके हाथों में क़लम है उनका दायित्व तो सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है,तो आप का भय आपकी ईमानदारी से कितना बड़ा है ये आप तय करें। 

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आज की रचनाऍं- 

स्मृतियों की कतरनें भी
कर देतीं मरहम पट्टी ।
किसी दिन फिर कभी
उङेगी पतंग कहीं !
आकाश के चंदोबे पे
सलमा-सितारों सी !
हवा में तैरती मलंग सी,
नीली नदी में गोते लगाती,
इठलाती, बल खाती,
उचक कर ठहर जाती
धूप की मचान पर !


 


वह 1000 Watt का बल्ब

पूरे शहर को रौशन करने की ज़िद में

खुद को जला बैठता है,

और अपनी ही तपिश से

फ्यूज हो जाता है




धूप की महक


बसंत की बहार  
जल्द अपने पीले
रंग - बिरंगें फूलों 
के शबनम झूलों
में झूलता बाग 
कोकिल मधुर गान गाए



"आपको अफ़सोस है?"

"अफ़सोस? नहीं... बस कभी-कभी सोचती हूँ, अगर पढ़ाई जारी रखती तो क्या होता?"
फिर अचानक उन्होंने गर्व से कहा, "तब फिर तुम्हारे चाचाजी का टिफिन कौन पैक करता? उनके फेवरेट मेथी के पराठे कौन बनाता!" इन पराठों ने तो मेरी पहचान बना दी?"

शगुन मुसकुराई. उसने चाची से भावनात्मक कनेक्शन स्थापित कर लिया. और पराठों का राज़ भी हाथ लगा! उसका यह प्रयोग भी सफल रहा.



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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