जावेद अख्तर
भारतीय सिनेमा के एक दिग्गज कवि, गीतकार और पटकथा लेखक हैं। उनका जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था। वे हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा व्यक्तित्व में से हैं जिन्होंने शब्दों के माध्यम से भारतीय समाज और सिनेमा की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जावेद अख़्तर भारतीय सिनेमा और साहित्य के एक ऐसे स्तंभ हैं, जिनका लेखन अपनी सादगी, गहराई और सामाजिक चेतना के लिए पहचाना जाता है। उनकी शैली को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: पटकथा लेखन, गीत और कविता।
जावेद अख़्तर की सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा की सादगी है। उनके अनुसार, लेखन ऐसा होना चाहिए जिसे अधिक से अधिक लोग आसानी से समझ सके। वे कठिन उर्दू या हिंदी शब्दों के बजाय बोलचाल की भाषा का उपयोग करते हैं, जिससे उनके गीत और कविताएँ सीधे दिल को छूती हैं।
उनके फिल्मी गीत मात्र मनोरंजन नहीं होते, बल्कि उनमें जीवन के गहरे फलसफे छिपे होते हैं। लगान, कल हो ना हो और दिल चाहता है जैसी फिल्मों में उनके लिखे गीत मानवीय भावनाओं और अस्तित्व के सवालों को खूबसूरती से व्यक्त करते हैं।
तरकश,लावा,इन अदर वर्ड्स इनकी प्रमुख कृतियॉं है।
वे केवल एक लेखक ही नहीं, बल्कि एक प्रखर वक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। वे राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। जावेद अख्तर सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर निडरता से अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं।
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आइए आज पढ़ते हैं उनकी कुछ ग़ज़लें
और सुनते हैं कुछ शाइरी।
जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो
फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है
किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो
ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने
क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो
इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँ है
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो
तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो
ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो
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याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा
कल रस्ते में उस ने हम को पहचाना तो होगा
डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा
कुछ बातों के मतलब हैं और कुछ मतलब की बातें
जो ये फ़र्क़ समझ लेगा वो दीवाना तो होगा
दिल की बातें नहीं है तो दिलचस्प ही कुछ बातें हों
ज़िंदा रहना है तो दिल को बहलाना तो होगा
जीत के भी वो शर्मिंदा है हार के भी हम नाज़ाँ
कम से कम वो दिल ही दिल में ये माना तो होगा
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मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाए हमने पाने में
वो शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में
जो मुंतिज़र न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलटके आने में
लतीफ़ था वो तख़य्युल से, ख्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में
समझ लिया था कभी इक सराब को दरिया
पर इक सुकून था हमको फ़रेब खाने में
झुका दर॰ख्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
॰ज्यादा फ़॰र्क नहीं झुकने-टूट जाने में
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दर्द अपनाता है पराए कौन
कौन सुनता है और सुनाए कौन
कौन दोहराए फिर वही बातें
ग़म अभी सोया है, जगाए कौन
अब सुकूँ है तो भूलने में है
लेकिन उस शख्स को भुलाए कौन
वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं
कौन दुख झेले, आज़माए कौन
आज फिर दिल है कुछ उदास-उदास
देखिए आज याद आए कौन
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मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं
तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं
कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ
कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं
कभी तो बात की उसने, कभी रहा ख़ामोश
कभी तो हँसके मिला और कभी मिला भी नहीं
कभी जो तल्ख़-कलामी थी वो भी ख़त्म हुई
कभी गिला था हमें उनसे अब गिला भी नहीं
वो चीख़ उभरी, बड़ी देर गूँजी, डूब गई
हर एक सुनता था लेकिन कोई हिला भी नहीं
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