सादर अभिवादन..
तनिक सी ही सोच है..
"माँ"
औरत का एक ऐसा किरदार है,
जिसमें संपूर्णता, पवित्रता, त्याग, ममता,
प्यार सब कुछ निहित होता है।
शायद ही दुनिया का कोई अन्य रिश्ता ऐसा हो,
जिसमें इतनी सारी खूबियाँ एक साथ होती हों।
माँ हमेशा अपनी संतानों के लिए
बेहतर और भला ही सोचती है
और हर वक्त बस इसी चिंता में डूबी रहती है
कि मेरी संताने कहाँ और कैसी होगी किस हाल में होगी।
हम भले ही कितने ही समझदार गंभीर
व उम्र में बड़े हो जाएँ परंतु माँ की चिंता
हमारे लिए तब भी वैसी ही रहती है,
जैसी कि बचपन में होती थी।
स्मृतिशेष श्रीमति ऊषा सिंह
आज का अंक मेरी सखी पम्मी जी की
माताश्री स्मृतिशेष श्रीमति ऊषा सिंह
को समर्पित है यह अंक.....

ममता की मूरत...
क्या सीरत क्या सूरत थी
माँ ममता की मूरत थी
पाँव छुए और काम बने
अम्मा एक महूरत थी
बस्ती भर के दुख सुख में
एक अहम ज़रूरत थी

माँ संवेदना है.....
माँ, माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ, माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
माँ, माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,
माँ, माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,
माँ, माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
माँ, माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,

माँ..मेरी माँ
मुझको हर हाल में बख़्शेगा उजाला अपना
चाँद रिश्ते में तो लगता नहीं मामा अपना
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

माँ की ममता...
जब परेशानी में फँस जाते हैं हम परदेस में
आंसुओं को पोंछने ख्वाबों में आ जाती है माँ
मरते दम तक आ सका न बच्चा घर परदेस से
अपनी सारी दुआएं चौखट पे छोड़ जाती है माँ
बेसन की सोंधी रोटी....
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ
ईश्वर से केवल एक ही निवेदन
वे किसी से किसी की
"माँ" न छीने....
इस अंक में प्रस्तुत सभी रचनाएँ हिन्दी व्याकरण से साभार
तनिक सी ही सोच है..
"माँ"
औरत का एक ऐसा किरदार है,
जिसमें संपूर्णता, पवित्रता, त्याग, ममता,
प्यार सब कुछ निहित होता है।
शायद ही दुनिया का कोई अन्य रिश्ता ऐसा हो,
जिसमें इतनी सारी खूबियाँ एक साथ होती हों।
माँ हमेशा अपनी संतानों के लिए
बेहतर और भला ही सोचती है
और हर वक्त बस इसी चिंता में डूबी रहती है
कि मेरी संताने कहाँ और कैसी होगी किस हाल में होगी।
हम भले ही कितने ही समझदार गंभीर
व उम्र में बड़े हो जाएँ परंतु माँ की चिंता
हमारे लिए तब भी वैसी ही रहती है,
जैसी कि बचपन में होती थी।
स्मृतिशेष श्रीमति ऊषा सिंह
आज का अंक मेरी सखी पम्मी जी की
माताश्री स्मृतिशेष श्रीमति ऊषा सिंह
को समर्पित है यह अंक.....

ममता की मूरत...
क्या सीरत क्या सूरत थी
माँ ममता की मूरत थी
पाँव छुए और काम बने
अम्मा एक महूरत थी
बस्ती भर के दुख सुख में
एक अहम ज़रूरत थी

माँ संवेदना है.....
माँ, माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ, माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
माँ, माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,
माँ, माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,
माँ, माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
माँ, माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,

माँ..मेरी माँ
मुझको हर हाल में बख़्शेगा उजाला अपना
चाँद रिश्ते में तो लगता नहीं मामा अपना
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

माँ की ममता...
जब परेशानी में फँस जाते हैं हम परदेस में
आंसुओं को पोंछने ख्वाबों में आ जाती है माँ
मरते दम तक आ सका न बच्चा घर परदेस से
अपनी सारी दुआएं चौखट पे छोड़ जाती है माँ
बेसन की सोंधी रोटी....
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ
ईश्वर से केवल एक ही निवेदन
वे किसी से किसी की
"माँ" न छीने....
इस अंक में प्रस्तुत सभी रचनाएँ हिन्दी व्याकरण से साभार
