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बुधवार, 19 जुलाई 2017

733.. मिलती जुलती सी बातें हैं ..

१ ९  जुलाई २ ० १ ७ 

।। ॐ आदित्याय नम: ।।


नमस्कार एवम् शुभेच्क्षा,
अथ श्री सुभाषित कथ से ..


अल्पानामपि वस्तूनां संहति: कार्यसाधिका तॄणैर्गुणत्वमापन्नैर् बध्यन्ते मत्तदन्तिन:


(छोटी­ छोटी वस्तुएँ एकत्र करने से बडे काम भी हो सकते हैं। जैसे घास से बनायी हुर्इ डोरी से मत्त हाथी बांधा जा सकता है।)


आज के  लिंक की शुरुआत इन शब्दों से... कि 


 '' बड़ी ही मिलती जुलती सी बातें हैं 

इन अल्फ़ाज़ों में ,

फिर भी जुदा-जुदा  ही नज़र आती है

हर कातिब के तहरीरों  में..''


इन्हीं शब्दों पे गौर करते हुए इन लिंको पर  निग़ाह डाले..   
  
श्रीमान हर्ष महाजन 'हर्ष 'के कलम से निकली मानवीय संवेदनाओं से भरपूर गज़ल....



आज भारत की जमीं पर ऐसा क्यूं आतंक है

अपनो का गैरों से मिलके साजिशों का रंग है ।


कौन किसके दर्द की रक्खे खबर इस देश में,

हर तरफ आतंकी हमले हर तरफ हुड़दंग है ।


श्रीमान अजय कुमार झा द्वारा रचित विचारणीय लेख..


पुरुष तन के भीतर स्त्री मन ....


कल हमारी बहुत सी मित्र दोस्त सहेलियों ने बड़ी ही मार्के की बात कही , वैसे ऐसा तो वे अक्सर करती हैं , कि सालों साल और लगभग पूरी उम्र हमारी माँ , बहिन और पत्नी की भांति वे सब , घरेलू काम , जिसमें सबसे प्रमुख घर के सभी सदस्यों के पौष्टिक और सुस्वाद भोजन तैयार कर सबको खिलाना , सबसे अहम् , को चुपचाप , बिना किसी पारिश्रमिक


संवाद-जंक्शनसे हास्य-वयंग्य का आनंन्द ले ..


मैं एयरपूंछ से फलानी बोल रही हूं, संजय जी बोल रहे हैं ?

संजय जी तो यहां कोई नहीं है ! ....

.......(तिन्न-मिन्न, कुतर-फुतर.....)

यहां तो संजय ग्रोवर है.....
(आजकल एक साइट भी, जो पहले संजय ग्रोवर के नाम से

 मेल भेजती थी, संजय जी के नाम से भेजने लगी है,

लगता है निराकारअपनी पोल ख़ुद ही खोलने पर उतारु है)


 श्रीमती शेफाली पाण्डे द्वारा प्रस्तुत  अनूठी गीतमाला


टॉप टेन बरसात के गाने और सन्दर्भ सहित व्याख्या ---


पिछले कई सालों से, जी हाँ भाइयों और बहनों ! नंबर एक पायदान पर

 विराजमान जो गाना है, वो है ----''तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए ---''
गाना समर्पित है पति और पत्नी को प्रस्तुत पंक्तियों में पत्नी 

अपने पति को सम्बोधित करती हुई कहती है कि

 हे प्रियतम ! तुम्हारी नौकरी नौकरी चाहे लाखों की हो लेकिन

 मेरे लिए वह दो टके की भी नहीं है, अगर उस नौकरी से मैं सावन

 के महीने के दौरान लगने वाली सेल में बम्पर शॉपिंग न कर सकूं | जिस तरफ भी


 श्रीमान लोकेश नदीश द्वारा भावमयी रचना ..


आँखों का पानी लिखता हूँ


शब्दों की ज़ुबानी लिखता हूँ

गीतों की कहानी लिखता हूँ
दर्दों के विस्तृत अम्बर में

भावों के पंक्षी उड़ते हैं..


अन्वीक्षा कर,


  शब्दों द्वारा संवाद  बनाए रखने की


आकांक्षी  

' विचार पूर्ण मन में ही नव-विचार और भाव उदित होते हैं .'..


।।इति शम।।

पम्मी सिंह
धन्यवाद।

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