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शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

728.....लिखता गया लिखते लिखते शायद लिखना आ जाये

सादर अभिवादन
लिखना-पढ़ना
आना-जाना
चलना-फिरना
उठना - बैठना
रोना-हंसना
रूठना-मनाना

और....
जलाना-बुझाना
ये जिन्दगी का
एक अहम हिस्सा है
इसमें कोई नयापन नहीं

आज की पसंदीदा रचनाओं के सूत्रों पर एक नज़र...


सत्य संधान .........डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
शैतानों की इस नगरी में इंसान खोजते हो?
मरू भूमि में बागों का उन्वान खोजते हो?
जहाँ केवल पेट की ही चिंता सर्वोपरी हो,
वहाँ चिंतन महान खोजते हो ??



आज पति बहुत खुश है। ऑफिस से लौटते हुए पत्नी के लिये गजरा ले कर आया। पत्नी खुश। बोली - अपने हाथों से लगा दो। 
मां ने मुंह बिचका कर कहा - जोरू का गुलाम कहीं का।
मां को नाराज़ देख बेटा अगली सुबह मां की मनपसंद जलेबी ले आया।
पत्नी ने मुंह बिचकाया - चम्मच।

चुप बहुत उदास रही राह की वीरानियाँ
वो दीप प्रेम के लिए हर मोड़ को सजा गया

खिले लबों का राज़ क्या लोग पूछने लगे
धड़कनों के गीत वो सरगम कोई सुना गया

बड़बड़ाना  अक्स  अपना आईने में देखकर 
इस तरह ज़ाहिर वो अपनी  बेबसी करते रहे 

रोकने की कोशिशें तो खूब कीं पलकों ने पर 
इश्क़ में  पागल थे  आँसू  ख़ुदकुशी करते रहे

है  सराफ़त से  तेरी  बज्म  में जीना मुश्किल ।
साफ  दामन  पे  बहुत  शाद  करेगी दुनिया ।।

कत्ल  करने  का सलीका भी अजब है यारों ।
हर  सही  बात  पे  अपवाद  करेगी  दुनिया ।।

तितली....रवीन्द्र सिंह यादव
फूल तुम
यों ही
खिले रहना,
मदमाती
ख़ुशबू से
कल सुबह तक ...
यों ही
महकते रहना।



उम्मीदों की अब ऊँची थी फरमाईश,
बारिश की बूँदों में भीग जाने की थी अब ख्वाहिश,
श्रापित जीवन से मुक्त हुआ वो अन्तर्मन,
कुछ बूँदे! ..जाने क्या जादू कर गई थी सूखी डाली पर..

चलते-चलते एक पुराने अखबार की कतरन..
लिखने पढ़ने का
कुछ हुवा या नहीं 
वो खुदा जाने पर 
मक्कारी में जरूर
उस्ताद हो गया हूँ
निरक्षरों को अब 
साक्षर बना रहा हूँ
खाली बिलों में
दस्तखत करना
सिखा रहा हूँ
बुद्धीजीवी का
प्रमाण पत्र 
जब से मिला है
लाल बत्ती गाडी़
पर लगा रहा हूँ

सादर ..

एक छोटा सा वीडियो मात्र एक मिनट जाया करेगा आपका










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