सादर अभिवादन
आज श्वेता जी नहीं है
शायद कल मिलेंगी
शायद कल मिलेंगी
रचनाएं ....
“हाँ माँ… वो तितली बन गई।” राधिका ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—
थोड़ी देर रुकी, फिर धीमे से पूछा-
“और मैं…! मेरे लिए माँ तुम कब कहोगी, बनना तितली! देखना मेरे पंखों के रंग किसी अन्य की हथेलियों में नहीं दिखेंगे!” उस दिन पहली बार, उसने खिड़की बन्द नहीं की।
आज बारिश बरसते हुए
मेरे साथ मुस्कुराई
उसने कहा, आज मैं
आँखों के पानी की तरह
नहीं बरसूँगी
मुस्कुराहट के मोतियों सी
बिखरुंगी
कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी
खिड़की के शीशे पर
इतिहास कह रहा है ज़रा सी न भूल हो
स्वार्थ की तनिक सी भी मन पर न धूल हो
शृंगार करें मिलके सभी राष्ट्र-धर्म का
हाथ में सद्भाव का सुन्दर-सा फूल हो ।।
मैं मुखड़ा गाता,
तुम अंतरा गातीं
या गीत के सम पर किसी
वाद्य यंत्रों की जुगलबंदी-सी
थाप अपनी हथेलियों की,
लिए खनखनाहट अपनी चूड़ियों की,
पीठ पर मेरी थपथपाती कभी।
या फिर ..
बतकही पर मेरी किसी,
"वाह-वाह" ना सही,
निकालती कोई मीन-मेख ही तुम कभी .. बस यूँ ही ...
समंदर के देश में मछलियां मरती नहीं है
उनकी सामूहिक हत्या की जाती हैं
मेरे देश की तरह उन्हें मुआवजा नहीं मिलता है
हां मेरे देश की तरह वहां हत्यारे
पुनः पुनः आ जाते हैं बेखौफ
सादर समर्पित
सादर वंदन



