मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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कभी जब मन उदास हो तो कुछ भी नहीं अच्छा नही लगता और कभी नभ में उड़ता अकेला पक्षी भी मन को आशा से भर देता है। इसी तरह किसी की लिखी अच्छी, रौशन बातें पढ़कर भी मन उत्साह से भर सकता है।
नकारात्मकता की भीड़ को परे धकेलकर
आइये क्यों न कुछ सकारात्मकता आत्मसात करें-
अपने जीवन में अच्छे बुरे बदलाव का कारण सिर्फ़ और सिर्फ़ हम स्वयं होते हैं। दुनिया हमारे अनुसार चलेगी ऐसा सोचने से बड़ी बेवकूफी कुछ नहीं है।
कहीं पढ़ा था-
*"जब आप उड़ने के लिए पैदा हुए हो, तो जीवन में रेंगना क्यों चाहते हो?"
*“तुम सागर की एक बूंद नहीं हो। तुम एक बूंद में सारा सागर हो।”
*"अपने शब्दों को ऊँचा करो आवाज को नहीं! बादलों की बारिश ही फूलों को बढ़ने देती है, उनकी गर्जना नहीं।"
*"दुनिया की परवाह करके दुखी होने से बेहतर है स्वयं से प्रेम करो, आनंद में रहो।"
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आज की रचनाऍं-
झड़ने शुरू हो जायेंगे
पत्ते
फेंक दिए जायेंगे
बुहार कर शहर के बाहर
कूड़े के ढेर में
मिटटी से मिलने की उनकी चाहत
अधूरी रह जायेगी
इस बार भी .
पत्ते
फेंक दिए जायेंगे
बुहार कर शहर के बाहर
कूड़े के ढेर में
मिटटी से मिलने की उनकी चाहत
अधूरी रह जायेगी
इस बार भी .
शब्दों का यह अधूरापन वाक्य रूपी समाज में
एक चिरगामी रिक्तता का आविर्भाव कराता है।
यह रिक्तता व्यक्तिगत नैतिकता को जीर्ण करती है
और समाज को शून्यता के दुश्चक्र में झोंक देती है॥
मिट्टी का जिस्म मिले मिट्टी में ।
ले कर क़्या साथ बशर जायेंगे ।।
आईनों से मत सच को पूछो ।
सुन के सच, आप मुकर जायेंगे ।
आयुष ने रोहित की आँखों में देखा, आत्मविश्वास. वह आत्मविश्वास जो सिर्फ अच्छे अंकों से नहीं, बल्कि एक सुनिश्चित पृष्ठभूमि से आता है. रोहित के पिता आईआईटी से थे. उसकी बहन आईआईटी में थी. उसका घर शिक्षा से भरा था.
आयुष के पिता फैक्ट्री में सहायक मैनेजर थे. उनके लिए आईआईटी एक सपना था; एक ऐसा सपना जो वे अपने बेटे के माध्यम से पूरा देखना चाहते थे.
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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