सादर अभिवादन
वासंती बयार प्रारम्भ
शिवरात्रि तक चलेगा
विश्वास करने को जी नहीं चाहता
कि ऐसे युग में भी जिए है हमारे अपने पूर्वज
70 पार की मानसिक हलचल
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“हां मेरे समय के पहले की बात है। पर अपने बचपन में (1970 की आसपास)
बनारस में कोयले से चलता रोड रोलर तो अपनी आंखों देखा है।” टुन्नू ने कहा।
बैलगाड़ी का कारवां, स्टीम इंजन की बस — हमारी कल्पना में भी नहीं था यह भारत, यह इलाका।
मैने सोचा – गज़ब चल रहा है टुन्नू का यह बताना।
मैं टिप्पणी करने में असमर्थ हुआ
मैं टिप्पणी करने में असमर्थ हुआ
दृग से दृग का ज्यों हो मिलना
रेख अधरों का संवरना
दृष्टि में उतरा वसंती
कौमार्य का मादक सा हँसना
भाव गूँथे वेणियों में
केश बिच यामिनी का अंतरण है
तुम्हारा स्पर्श
किसी एक बिंदु पर
आकर ठहर जाता है,
जबकि मेरा अस्तित्व
घूमता रहता है
अपने ही केंद्र के चारों ओर।
तुम आगे बढ़ती हो
दिशा के भरोसे,
मैं लौट आता हूँ
हर बार
खुद तक।
एक प्याली चाय और तुम्हारी हँसी
अपनी हँसी ...
सोती जागती भागती जिंदगी
के बीच एक स्त्री की हँसी
वह रिक्त कोना जहाँ अक्सर अपने
जिम्मेदारियों का बीहड़ उगाते रहते है
ओह बड़ा सुकून मिला यह सुनकर। चलो अच्छा हुआ कम से कम यहाँ अकेले नहीं रहना पड़ा।
उसने तसल्ली से सिर हिलाया।
उसने तसल्ली से सिर हिलाया।
नाश्ता खत्म हो चुका था। उसने प्लेट उठा ली। काउंटर पर थर्मस फ्लास्क देखकर
मैंने पूछा क्या पिला रही हो चाय या काफी?
मैंने पूछा क्या पिला रही हो चाय या काफी?
वह मुस्कुराई जो आप को पसंद हो मैम चाय भी है काफी भी है।
अच्छा तब एक कप बढ़िया कॉफी पिला दो ।वह कॉफी बनाने लगी। तब तक अन्य लोग चाय दूध कॉफी लेने वहाँ आ गये और मैं भी कुर्सी पर बैठ कॉफी पीने लगी।
काॅफी खत्म कर खड़े होते एक नजर उस पर डाली वह मुझे ही देख रही थी। सौंफ लेते मैंने उससे कहा नाश्ता कर लेना बेटा और अपनी भीगी आँखें उससे छुपाते बाहर आ गई
इस उम्मीद के साथ कि सभी बेटियों को ऐसे ही प्यार के दो बोल मिलें चाहे वे कहीं भी हों।
आ गए राजा बसन्ती, क्या छटा रस रूप की
मैं निराली संग हो ली, चिर सुहागिन भूप की ।
नाम मेरा सरस सरसों, बरस बीते मैं खिली,
देख निज राजा बसन्ती, पुलकती फूली फली ।
आज बस
सादर वंदन
