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सोमवार, 2 जून 2025

4407 ..किलकी नदियाँ लहरें बहकी जलतरंग जल पर चहकी

 सादर अभिवादन

किलकी नदियाँ लहरें बहकी
जलतरंग जल पर चहकी


और बारिश चालू हो गई
पन्ने पुराने पलटने लगे
बेसन का डब्बे का एक अतिरिक्त 
और मूंग , उड़द की दाल भी अतिरिक्त 
रक्खा गया, प्याज , बैगन और मिर्च भी
तैय्यार रक्खें......

इस अँक में पेटी से निकली कविता भी है

देखिए एक झलक




वह पत्र
बस, उसी ने नहीं पढ़ा
लिखा था जिसके लिए
दोष किसी का नहीं
महज भूल थी
पत्र लिखने वाले की...
तुम्हीं कहो,
क्या आमावस में
चांद कभी आता है आकाश में?



शब्द!
हां शब्द!
संचय कर के रखिए।
वैसे ही जैसे रखते थे ऋषि
क्योंकि,
शब्द अद्भुत होते हैं ,
शब्द मात्र अर्थ नहीं ,
बहुधा अर्थात भी होते है ।




बैठकर प्यार से फ्रंट की सीट पर
करना इज़हार तुम फिर मेरी कार में
जीत में तो सभी ही देते मगर
साथ तुमने दिया है मेरी हार में





“मैं एक प्रतिमा की तलाश में हूँ।”
“कौनसी प्रतिमा ?”
“मैं नहीं जानता।”
“क्या मतलब ?”
“मैं नहीं जानता कि वह प्रतिमा कैसी दिखती है।”
“फिर तुम उसे तलाश कैसे करोगे ?”
“मैं नहीं करूंगा। तुम करोगे।”
“कैसे ?”
“जो कोई भी उस प्रतिमा का स्पर्श करेगा, उसे उस प्रतिमा में से लाल, हरे और नीले रंग की मिश्रित रोशनी निकलती हुई दिखेगी। यही उसकी पहचान है।” - कहते हुए स्टोनमैन बोला - “जितना जल्दी हो सके, उस प्रतिमा को ढूंढो और लाकर मुझे दो।”





संग ले जाए सुदूर अपने समानांतर, न
जाने कितने घुमरी छुपाए सीने में
नदी बहती है मेरे अस्तित्व के
अभ्यंतर । कोई वशीकृत
पंछी की तरह मैं पंख
अपने कटवाना
चाहूँ, चाह
कर भी,





उँगली थामे संग माता - पिता रक्षक
ममता के आगार , कई बार गिरी थी
उसी आँगन में पली - बढ़ी थी
जो जीवन मैंने अब तक जीया
उसकी गहरी नीवं यही पड़ी थी
विचलित न होने का धैर्य मिला था
तो इसी जन्मदात्री भूमि से
हर चीज मन माफिक हो यह जरुरी नहीं
पर संघर्ष से तुम चूको न






एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि मैं हमारी रक्षा सेनाओं द्वारा पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर किए गए लक्षित हमलों का स्वागत करता हूँ. पाकिस्तानी डीप स्टेट को ऐसी सख्त सीख दी जानी चाहिए कि फिर कभी दूसरा पहलगाम न हो. पाकिस्तान के आतंक ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए. जय हिन्द। आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि जय हिंद! जय भारत! न आतंक रहे, न अलगाववाद रहे. हमें अपने वीर जवानों और भारतीय सेना पर गर्व है।



पेटी से निकली रचना


डोले पात-पात,बोले दादुर
मोर,पपिहरा व्याकुल आतुर
छुम-छुम,छम-छम नर्तन
झांझर झनकाती बूँद की पाँव

किलकी नदियाँ लहरें बहकी
जलतरंग जल पर चहकी
इतराती बलखाती धारा में
गुनगुन गाती मतवारी नाव


आज बस

सादर वंदन

शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

4407 ...बेटों की सेवा का थोड़ा सुख और ले लो

 


सादर अभिवादन


22 फरवरी
ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 53वॉ दिन है।
साल में अभी और 312 दिन बाकी है
फिर हैप्पी न्यू इयर

रचनाएं देखें




नगरी अति प्राचीन अयोध्या
युग बीते जब राम हुए थे,
स्मृतियाँ संजो रखी देश ने
कैसे अनुपम कर्म किए थे !





कई बार जीती हूँ , कई बार हारी हूँ
जीत-हार की जंग में..,
न अपनों से शिकवा न ग़ैरों से गिला है





निर्मल नभ है मन चंचल है, सुधरा है परिवेश,
माटी के कण-कण में, अभिनव उभरा है सन्देश,
गीतों में लावणियाँ लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!





बुरांश मूल रूप से भारतीय है, यह पूरे हिमालयी इलाकों में फैला हुआ है। यह भूटान, चीन, नेपाल और पाकिस्तान, थाईलैंड और श्रीलंका में भी पाया जाता है। उत्तराखंड में पारंपरिक उपयोग के तौर पर बुरांश के फूल की पंखुड़ियों का उपयोग खाने में किया जाता है। इसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है। लगभग सभी धार्मिक कार्यों में देवताओं को बुरांश के फूल चढ़ाए जाते हैं।






दादी जब बीमार हुईं तो उन्होंने बता दिया था कि वे पूर्णमासी को चली जाएंगी क्योंकि सपने में बाबा बता गए थे बेटों की सेवा का थोड़ा सुख और ले लो फिर पूर्णमासी को हम साथ ले जाएंगे।

पूर्णमासी वाले दिन सुबह से दादी की तबीयत में बहुत सुधार था। सब चैन की साँस ले रहे थे। लेकिन दादी ने शोर मचा दिया कि जल्दी खाना बनाओ और सब लोग जल्दी खा लो। खाना बनते ही सबसे पहले जो युवा सेवक घर के काम के लिए नियुक्त था कहा पहले इसे खिलाओ। बोलीं मैं चली गई तो तुम सब तो रोने-धोने में लगे रहोगे ये बेचारा भूखा रह जाएगा। वो मना करता रहा पर अपने  सामने बैठा कर उसे खूब प्रेम से खिलाया -पिलाया फिर सबको कहा तुम सब भी जल्दी खाओ।


आज बस
वंदन
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