नमस्कार
लोरी माता देवकी द्वारा
सीधे चलें रचनाओं की ओर
एकांत में भी जहां मिले #बेहतरी,
जहां #भरोसे को न लगे #हथकड़ी,
मिले न कोई वहां #वहशी #जंगली ,
#बेरहमी से न जाये कभी #मसली ।
मेरे टूटने की ना चिंता करो तुम,
हजारों दफा टूट कर मैं जुड़ी हूँ !
जुड़ी तो जुड़ी, जोड़ती भी रही जो,
विधाता के द्वारा गढ़ी, वह कड़ी हूँ !
मजबूरी में विदा किया
पर चैन कहाँ उन्हें खोकर
उन राहों पर बिछी थी आँखे
जहाँ से निकले वो होकर
सुन, जिसे वो समझ न पाए
गीत वही क्यों गाया हमने!
प्यारे नीम के पेड़
मैं खुश हूँ कि
देख पा रही हूँ तुम्हें
फिर से हरा भरा .
बीत गया बुरे सपने जैसा
वह समय
जब निर्दयता से
चला दी गयी कुल्हाड़ी तुम्हारी हरी भरी शाखों पर
किताबें ख़रीदने का शौक़ है मुझे,
पर पढ़ने का नहीं,
अच्छी लगती हैं मुझे
अलमारियों में किताबें,
जैसे खिड़कियों पर परदे,
सेंटर टेबल पर गुलदान,
दीवारों पर पेंटिंग्स,
बालकनी में गमले।
आज बस
सादर वंदन




