नमस्कार
दे ! अपने स्नेह की डोर
और मुझे कुछ भान नहीं
वृष्टि कर तूं अमरप्रेम की
और मुझे कोई चाह नहीं
बाँध मुझे फ़ेरे विश्वास के
मिले मुझे एक राह नई
हटा अँधेरा ! जीवन से मेरे
बन ! 'बहना' एक आस नई
-एकलव्य
सीधे चलें रचनाओं की ओर
हम भारतवासी एक क्षण को सभी स्वार्थपरक उद्देश्यों को दर किनार कर बँधते हैं इस पावन पर्व के अनमोल डोर में,जो याद दिलाता है हमारा कर्त्तव्य अपनी प्यारी बहना के लिए। सूनी कलाई पर बहना का प्यार आनन्दित करता है हमें ,एहसास कराता है ,कोई तो है जिसका अनमोल प्यार उन सभी स्वार्थपरक उद्देश्यों से ऊपर है।
विकास का क्रम निरंतर आगे बढे ! रिश्तों के इस प्यारे बंधन के साथ ,अपनों के होने का एहसास
''पाँच लिंकों का आनंद''
परिवार की ओर से श्रावणी पर्व और रक्षाबन्धन पर सभी भारतवासियों को हार्दिक शुभकामनायें !
मिनी-जुली रचनाएं देखें ....
भूले बिसरे ही सही जब याद करता है कोई,
गै़र मुमकिन रोक पाना हिचकियाँ आती तो है
भीख मागूं मैं किसी से ये कभी मुमकिन नहीं,
मुफ़लिसी में मेरी खुद्दारी ये समझाती तो है
वो निश्चिंत थी
स्वयं को मानकर सुरक्षित
कर रही थी
निष्काम कर्म...!!
कहां पता था उसे...
किसी की नजर उस पर गड़ी थी
लहुलुहान निर्जीव वो पड़ी थी...!
जुगाड़ के इस
गजब के हुनर
को कोशिश कर
देश के काम
में लाने का
कुछ जुगाड़
आज लगायें
जुगाड़ी
देश वासियों को
चलो ये संदेश
आज दे कर आयें
वृक्षों पर झूलों की पींगे जब चढ़ती है
आसमान की ऊंचाइयों में सखियां
झूल-झूल कर हंसती है
धरती झूमती है
प्रकृति निखरती है
पक्षियों की सुमधुर ध्वनियों से सावन में
प्रकृति समृद्ध और संगीतमय हो जाती है
जन्मदिन का उपहार
सुभाष (मेरे पति) ने सुबह ही कहा -
"आज कुछ बनाना नहीं। लंच के लिए हम बाहर चलेंगे।
प्राप्ति श्रोत
चलते-चले ये गीत सुनिए
आज बस
कल मिलिएगा श्वेता जी से


