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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

419...खबर है खबर रहे प्रश्न ना बने ऐसा कि कोई हल करने के लिये भी कहे

सादर अभिवादन...
स्वागत करती हूँ 
चार सौ उन्नीसवीं पृष्ट में
आप सभी का.....


है छन छन के आती  झुरमुट पेड़ों  से रौशनी
देख  हमें  आज तो  यहाँ  रौशनी  भी  शरमाई है

बस आ जाओ तुम इस दिल को पहचानो सनम मेरे, 
सागर  की   लहरों  सी   गहराई  दिल  में  समाई  है । 

ये थी बात जो आज जन्माष्टमी पर हुई .अब मैंने सोचा वो जाने कब अपनी प्रतिक्रिया लिख कर दें और जरूरी नहीं दे भी पायें . कहना मेरा फ़र्ज़ बनता था . हर कोई अपनी ज़िन्दगी में बिजी है तो क्यों न मैं ही सारी बातचीत पढवा दूँ और खुद भी सहेज  कर रख लूं क्योंकि ये भी तो प्रतिक्रिया ही है फिर क्या जरूरी हो कि वो लिखित ही हो . मौखिक प्रतिक्रिया का भी अपना महत्व है . 

उसने 
नहीं दी चोकलेट उसको 
आखिर  वो  नहीं  चाहता 
मीठे प्यार और चोकलेट के मीठेपन का 
कोकटेल 
बढ़ा दे एकदम से 
उसका ब्लड शुगर लेबल 

अश्रु पोंछने को बहती इन आँखों के 
निज सुख का बलिदान तुम्हें ही करना है ! 

जग को तम से मुक्त कराना यदि तुमको 
तीक्ष्ण गरल का पान तुम्हें ही करना है ! 


निकल जाते तो ज्ञान पाकर
घर न लौटते
यशोधरा की व्यथा की फटकार न सुनते
राहुल को
यशोधरा को
अपने साथ न ले जाते !

अब पढ़िए एक साल पहले की रचना..
लिफाफे को किसने 
खोलना है किसने पढ़ना है 
पढ़ भी लिया तो कौन सा 
किसी खबर का जवाब 
देना जरूरी होता है 
कहाँ किसी किताब में 
लिखा हुआ होता है 
लगा रह ‘उलूक’ 
तुझे भी कौन सा 
अखबार बेचना है 









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