
हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
ज्योतिषाचार्य का कहना है कि सिर्फ मुँह से न बोलना मौन नहीं होता। मौन वास्तव में आपके मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है। मौन का मतलब आपके अंतर्मन की शांत, स्थिर और निर्मल बनाने से होता है। इस दिन मौन रहकर व्यक्ति को अपने मन में भी किसी तरह के गलत विचारों को नहीं लाना चाहिए। शांत रहकर खुद के अंतर्मन में झांकना चाहिए और मन की अशुद्धियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए और एकाग्र होकर प्रभु के नाम का स्मरण करना चाहिए। यह एक तरह का तप जैसा है। अगर कोई व्यक्ति पूरे दिन मौन नहीं रह सकता तो कम से कम स्नान और दान पुण्य से पहले मौन व्रत जरूर रखे। इससे आपके अंदर की नकारात्मकता दूर होती है और आध्यात्मिकता का विकास होता है।
मौन भी आनंद है
मौन भी प्रकृति है
मौन भी अनंत है
मौन भी आयाम है
मौन भी आगाज़ है
मौन भी आवाज़ है
‘फैलेगा-फैलेगा हमारा मौन… समुद्र के पानी में नमक की तरह… नसों में दौड़ते रक्त में घुलता हुआ पहुंचेगा दिल की धड़कनों के बहुत समीप….और बोरी से रिसते आटे सा, देगा हमारा पता… हमारे मौन के धमाके से बड़ा उस वक्त कोई धमाका नहीं होगा. (मशहूर कश्मीरी कवि डॉ शशि शेखर तोशखानी की कविता की चंद लाइनें)!
धर्म रक्षा के लिए हथियार ना उठाओगे !!
आने वाली पीढियों को क्या मुंह दिखाओगे !!
विधर्मी के रक्त से ये धरा अब शुद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो !!
आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :
बिना निशान की क़ब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
उनके पास कविता का कारखाना नहीं है। खेत है और बीज हैं। सिंचाई के लिए नदी का पानी है। लोहे के बन्द और लकड़ी से बना हाथा है, जिसके लिए उन्हें पहले बढ़ई के पास जाना पड़ा और फिर लोहार के पास भी। कुल मिलाकर वह 'हाथा मारने वाले' लेखक हैं।
"काग़ज़ पर मैं उतना अच्छा नहीं लिख पाता
इसलिए खेत में लिख रहा था
अर्थात हाथा मार रहा था।"