हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
हर सफल पंथी यही
विश्वास ले इस पर बढ़ा है,
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही
बाट की पहचान कर ले।
यह बुरा है या की अच्छा
व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
जब असंभव, छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना।
कहवाँ से अइला धनुर्धर बटोही,
अजईबा कहाँ कौन धाम,
हे बबुआ, आपन बता द तू नाम,
हे बबुआ, आपन बता द तू नाम,
केकरा के कुखिया में लीलहवा जनमवा,
राह पर चलते कई बटोही
वो मंजिल अपनी भटके हैं,
कभी राहें मंजिल बनती हैं,
कभी लगते घातक झटके हैं।
चौराहे पर खड़े बटोही
का अभिशाप बदल जायेगा
कितनी सदियों से घबराये
मौसम की दीवार ढह गयी
झंझावातों की फिसलन से
न साथ कभी चलाया राहगीर बने तब से,
जहां ने ऐसा सताया राहगीर बने तब से,
न करते हम जुरुरत राही बनने की कभी,
फरेब से दिल जलाया राहगीर बने तब से,
बिछाये कांटे हर राह और कहा साथ चलो,