आज का अंक अतिथि
चर्चा कार प्रिय रेणु जी के द्वारा संयोजित है।
आप पाठकों को समर्पित करते हुये उनका तहेदिल से स्वागत करती हूँ।
चर्चा कार प्रिय रेणु जी के द्वारा संयोजित है।
आप पाठकों को समर्पित करते हुये उनका तहेदिल से स्वागत करती हूँ।
मेरे स्नेही पाठक वृन्द को मेरा सादर और सप्रेम अभिवादन !
आज पांच लिंक मंच पर अतिथि चर्चाकार के रूप में उपस्थित होकर असीम गर्व की अनुभूति हो रही है | यदि देखा जाए ब्लॉग जगत में इन दिनों लेखन बहुत कम हो रहा है |फिर भी कई लोग हैं जो नियमित और सार्थक लेखन कर रहे हैं |उन्हीं में से कुछ रचनाएं लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ | आशा है आप सबको पसंद आएँगी |
शोध बताते हैं कि ब्रहमाण्ड को हम जैसी ऊर्जा सौंपते हैं वैसी ही ऊर्जा वह हमें लौटाता है। हमारे शब्दों में यदि आभार हो तो वे शब्द हमारे जीवन को करुणा, दया और प्रेम से भरकर अन्तर्मन की शुद्धि को प्रेरित करते हैं।इसी आभार को सहेजने और आत्मशुद्धि हेतु जन्म हुआ आभार डायरी यानि Gratitude journal का ।
प्रिय अनंता सिन्हा की आभार डायरी का एक पन्ना
अपनी स्नेही और कर्मयोगी नानी ( जिन्हें वे प्यार से न
न्नन पुकारती थी )के नाम जिसमें
उनके बहु आयामी व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।उनके
दिये संस्कारों ने ही साहित्य जगत
को एक अत्यंत संवेदनशील रचनाकर दी है।
"तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है ,
जहाँ भी जाऊँ , ये लगता है तेरी महफ़िल है"
और बस मुझे "नन्नन" की याद आ गई ।
नदी हो जाना ....
जब नदी के विशाल हृदय में आसमान प्रतिबिंब रूप में उतरता है तो उसके साथ बादल और चाँद भी अपनी मोहक अठखेलियों के साथ नदी के निर्मल जल में अपने बहुरंगी अस्तित्व को घोल कर नये रूप में प्रकट होते हैं।जिसके आभासी स्पर्श से बतखें ,पेड़ ,फूल ,मछलियाँ भावविभोर होते हैं तो नदी इस आनन्द की मौन साक्षी बनती है।गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की भावपूर्ण रचना में पढिये कि कितना मनमोहक है आसमान का नदी हो जाना ---
चाँद भी नदी में उतरकर
झूलता है लहरों के पालने में .
भूलता है ,कि चलना आसान नही है
नदी हुए आसमान में .
डगमगाता है ,फिसलता है ,
गीला होगया चाँद .
लेती हैं उसे
पानी पर झुकी बेंत की टहनियाँ
माता-पिता के दिए नाम नन्द राम दास से बने कवि बालबैरागी जी के बहु आयामी व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से जानने के लिए एक अनमोल लेख ब्लॉग ' एकोहम' से , जिसमें बैरागी कवि की उपलब्धियों भरी जीवन यात्रा का रोचक और भावपूर्ण वर्णन है वो भी उन्ही के द्वारा |
कहा जाता है राजनीति में दुश्मनों की और साहित्य में ईर्ष्यालुओं की संख्या जितनी ज्यादा होती है, व्यक्ति उतना ही अपने क्षेत्र में कामयाब माना जाता है।
मेरे माता-पिता अच्छे गायक थे। घर में संगीत का वातावरण था। पिताजी छोटी सारंगी (चिकारा) अच्छा बजाते थे। माँ के पास लोकगीत और सन्त गीत थे। सारा घर सुर में था। मैं कभी पिताजी और माँ के साथ गाया करता था। स्कूल के मंचों पर तो मैं चौथी-पाँचवीं कक्षा से ही आ चुका था। अपनी पहली कविता ‘भाई सभी करो व्यायाम’ अपनी चौथी क्लास में, 9 वर्ष की आयु में ही लिखकर अन्तर्कक्षा प्रतियोगिता में मैं अपनी कक्षा का प्रतिभागी प्रतिनिधि बना। चूँकि यह ‘भाषण प्रतियोगिता’ थी, सो तकनीकी तौर पर मेरी कक्षा हार गई, पर मुझे कविता के कारण पहला पुरस्कार मिल गया था। यह सन् 1940 या 41 का वर्ष था।
जीवन को अलग नजरिये से देखती भावपूर्ण
रचनाओं का अभिनव संग्रह है शान्तनु सान्याल जी का सुन्दर ब्लॉग 'अग्निशिखा'।उन्ही के ब्लॉग से जीवन की निस्सारता पर, दुनिया की सार्वभौम उदासीनता को उजागर करती एक रचना।जिसमें कवि मन के गहन नैराश्य भाव की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।कहाँ कोई मिट गये लम्हों को सहेजता है--आत्ममुग्धता में जी रहे लोगों का यही सच है।
स्मृति आलोक दीर्घायु नहीं होते, बहुत जल्द
लोग भूल जाते हैं झरते पत्तों की कहानी,
सूखे पलों को कोई नहीं चाहता है
सहेजना, टहनियों में कोंपलें
मनोज कायल जी की रचनाओं में प्रेम के संयोग-वियोग की सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है।उनकी रचनाएँ मोहक शिल्प में गढी गई हैं जिन्हें पढ़कर सदैव अच्छा लगता है। भावनाओं को विस्तार देती हुई उनकी नयी रचना
इस धूप की साँझ छाँव बनी थी जो कभी l
बूँद उस ओस की संगिनी सी गुलजार थी ll
हीना सी महका जाती यह अटारी फिर उस गली l
याद आ जाती वो मासूम अठखेलियाँ जब कभी ll
जब भी हम निराशा से घिर जाते हैं उसी के मध्य आशा की प्रबलता जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।जैसे रात के बाद सवेरा उगता है उसी तरह मायूसी के तम को हरने उम्मीदों का जगमगाता ज्योति पुंज उपस्थित हो जाता है।एक प्रेरक भावों की रचना
आदरणीया 'उर्मिला सिंह जी के ब्लॉग से --
माना हिय में घनघोर अंधेरा है
सूरज पर बादल का पहरा है....
पवन बहेगा बादल को छटना होगा
प्राची से सूर्य रश्मियों को हँसना होगा।।
और अन्त में--
ओशो एक उच्च कोटि के चिंतक और दार्शनिक रहे हैं।साहित्य, धर्म , आध्यात्म के साथ-साथ शायद ही कोई ऐसा विषय हो जिस पर उनके सारगर्भित विचार उपलब्ध ना हों।उनके विचारों की गहनता में डूब कर हर जिज्ञासु को परमानंद की अनुभूति होती है।यदि उन्होने कथित रूप से उन्मुक्त आचरण को अपनी आध्यात्मिकता का अहम हिस्सा ना बनाया होता तो संभवतःवे सदी के एक महान चिंतक कहलाये जाते।
कहा जाता है कि अपने लगभग 58 साल के लघु जीवन में उन्होनें लगभग एक लाख किताबें पढ़ी।आश्चर्य की बात है कि इतनी पुस्तकें पढ़ने के बावजूद उन्हें कभी आँखों पर चश्मा नहीं पहनना पढ़ा।जब उत्तम पाठक और विचारक ओशो से हिन्दी साहित्य के सुकुमार कवि प्रश्न करते हैं कि उनके सबसे प्रिय 12 लेखक कौन से हैं तो 12 से भारतीय संस्कृति के 4 आधार स्तम्भों तक का एक वह अत्यंत रोचक और भावप्रवण वार्तालाप,जिसे ओशो की जादुई वाणी ने और भी मोहक बना दिया है, मुझे लगता है कि हर साहित्य प्रेमी और जिज्ञासु को ये प्रसंग हर हाल में सुनना चाहिये।
इसके साथ ही प्रिय पम्मी जी को बेटे के विवाह की बधाई और शुभकामनाएं ।इस अंक पर सबकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
आज्ञा दीजिए
सादर नमन





