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सोमवार, 28 नवंबर 2022

3591/ न जाने कलम क्यों जाती थम!

 

नमस्कार !  आज करीब एक माह पश्चात यहाँ  आना हुआ ........ ब्लॉग जगत की सैर करते हुए  एक ही  डायलॉग बोलने का मन हुआ  कि ----- " इतना सन्नाटा क्यों है भाई " ..... ऐसा लग रहा  कि लोगों ने ब्लॉग पर लिखना ही शायद छोड़ दिया है या धीरे धीरे सब  चेहरे की किताब ( फेसबुक )  में शामिल हो गए हैं .... खैर ...... प्रयास किया है इस सन्नाटे को तोड़ने का ........लायी हूँ कुछ नयी  पुरानी तहरीरें  .... शायद पसंद आयें ........ 

इस लोक में भ्रमण करते हुए पारलौकिक अनुभव यदि मिले तो कैसा अद्भुत संजोग होगा ? ...... वैसे मेरा भी मानना है  कि ऐसे अनुभव होते हैं .....ऐसे अनुभव की  साक्षी  मैं स्वयं भी रही हूँ . 

पारलौकिक अनुभव


बस तभी से भोलेनाथ जपने लगी। मेरे प्रत्येक कठिन समय में भी उन्होंने मेरी उँगली थामे रखी और न जाने कितने अनुभव कराये, कभी शिशु भाव से तो कभी मित्र भाव से ... कभी-कभी तो मातृ भाव भी। मुझे लगता कि मुझको तो देवा प्रत्येक कठिनाई से निकाल लायेंगे और सारी तीक्ष्णता स्वयं पर ले लेंगे, परन्तु मैं पीड़ित होती थी कि यदि मैं इतनी परेशान हो जाती हूँ तो उनको कितना कष्ट पहुँचता होगा। 

आत्माओं की बात  पढ़ती हूँ तो बहुत रोमांच  हो आता है , ऐसा भी जाना समझा है कि  आत्माएँ अपने परिजनों की आत्मा को लेने आती हैं ...... शायद ऐसा ही कुछ रहा हो और निवेदिता जी को इस तरह का अनुभव हुआ हो ...... लोग इस लोक से परलोक जा कर भी रिश्ते निभाते हैं ,जब कि यहाँ रहते हुए कौन कितने रिश्ते संभालता है ये सोचने की बात है ........ इसी पर आइये पढ़ते हैं   दो कवितायेँ ....... 

शीर्षक एक है लेकिन लेखक और विषय वस्तु अलग अलग .....

रिश्ते

जितना बूझूँ, उतना उलझें

एक पहेली जैसे रिश्ते।

स्नेह दृष्टि की उष्मा पाकर,

पिघल - पिघलकर रिसते रिश्ते।


मेरे रीसायकल बिन में 

बहुत से टूटे हुए रिश्ते हैं,

कुछ मैंने तोड़ दिए थे,

कुछ ग़लती से डिलीट हो गए. 


अब रिश्ते डिलीट हों या न हों , लेकिन आज कल बहुत कुछ ज़िन्दगी से डिलीट हो जाता है अचानक ही ..... जब आर्थिक मंदी हो और नौकरियों पर अचानक गाज गिरे तो कैसा अनुभव होता है उसकी बानगी इस लघुकथा में देखिये .

“मंदी”


कैसे हो ? बहुत दिन हुए तुमसे बात नहीं हुई ?

हाल - चाल.., ठीक -ठाक ?” आदित्य के फ़ोन उठाते ही दूसरी ओर से उसके मित्र अनुज ने कुशल - क्षेम पूछी ।


कितना कठिन है ऐसी भयावह स्थिति को सहना .....वैसे तो बहुत कुछ जानते समझते भी हम लोग कितनी गलतियाँ करते हैं बिना यह सोचे कि आने वाली पीढ़ी को कितना सहना पड़ेगा ? हमारे एक ब्लॉगर साथी हैं जो प्रकृति से जुड़े हुए हैं , वो मानव को चेता रहे हैं .... काश उनकी बात सब तक पहुँच सके ....


हम जिंदा हैं


क्योंकि आज हम केवल चिंता में ही 
पिघल रहे हैं 
काश की 
धरा के साथ दरकते
और
ग्लेशियर के साथ
अंदर से

पिघलकर टूट जाते।


प्रकृति तो स्वयं ही संतुलन करती रहती है ......मनुष्य अपनी मनमानी  करता है तो प्रकृति अपनी , लेकिन उन पुरुषों का क्या ? जो सदैव केवल अपनी मनमानी करके परिवार का जीना दूभर किये रखते हैं ...... ऐसी ही एक सत्य घटना को उजागर किया है इस संस्मरण में .... 


मैं भी आगे बढी, देखा एक आदमी बीच रोड पर लेटा है, नशे की हालत में ।  गार्ड उसे उठाने की कोशिश कर रहा है,गुस्से के साथ । 
तभी एक अधेड़ उम्र की महिला ने आकर गार्ड के साथ उस आदमी को उठाया और किनारे ले जाकर गार्ड का शुक्रिया किया । 
नशेडी शायद उस महिला का पति था। थोडा आँखें खोलते हुए,महिला के हाथ से खुद को छुडाते हुए, लड़खड़ाती आवाज में चिल्ला कर बोला, "मैं घर नहीं आउँगा"। 

ओह ! तो  जनाब घर के गुस्से में पीकर आये हैं;  सोच कर मैने नजरें फेर ली,

वैसे कहने  को  तो ये सब संस्कार की ही बात होती है , लेकिन हम लोगों की कथनी करनी में इतना अंतर होता है कि बच्चे समझ ही नहीं पाते कि सही क्या है और गलत क्या ? ऐसी ही एक लघुकथा पढ़िए - 

परीक्षा


बेटा ! ये जो मेज पर प्लेट में धुले हुए, दो सेब रखे है, जाओ एक दादी माँ को दे दो एक तुम खा लेना ।” शगुन ने बेटे से कहा ।

बेटे ने सेव उठाया और चलते-चलते.. दाँतों से कुतरना शुरू कर दिया दूर बैठी, दादी ने ये दृश्य देखा और ज़ोर-ज़ोर से बड़बड़ाने लगीं ।

कभी कभी बच्चे  निःशब्द  कर देते हैं न ?  ऐसे ही निःशब्द  कर देती हैं कुछ कविताएँ / रचनाएँ  ...... ज़िन्दगी में बहुत कुछ विरोधाभास  होता रहता है लेकिन  उसे साधना भी आना चाहिए ..... 

म्यान


ये म्यान मेरा है

उसकी अपनी मजबूरियां है

तो फिर वायदा - कायदा को

तोड़-ताड़ करने में

कुछ जाता भी नहीं है

ज्यादा चिढेगा वो , भागेगा

और इस खोखले म्यान को तो

खाक होना ही है |


ब मयान में दो तलवार आयें या न आयें लेकिन काव्य की एक विधा ऐसी ज़रूर है जिसमें सोच दो तरह से होती है लेकिन जवाब अलग ही होता है ..... एक झलक आप भी देखें ....


कह मुकरी


हर पल मेरी लट उलझाए

चूनर मेरी ले उड़ जाए

फिरता वो चहुँ ओर अधीरा

को सखी साजन ? 

इस विधा में सखियों का संवाद चलता है .......  हालांकि  आज तो आपस में संवाद ही कहाँ हो पाता है ?  सब बहुत व्यस्त हैं ? पर  किन  कामों में व्यस्त हैं ये नहीं पता  ....... ऐसे ही भावों को समेटा है इस रचना में .... 

बैठे ठाले



स्वेटर की तो बात दूर हैं

घर के काम लगे भारी

झाड़ू दे तो कमर मचकती

तन पर बोझ लगे सारी

रोटी बननी आज कठिन है

बेलन छोड़ कलाई से।।

ये व्यंग्यात्मक रचना को   पढ़ थोडा विचार कर लें कि क्या यही सच है?  हो सकता है कि कुछ के लिए तो सच ही होगी ......चलिए ज़िन्दगी की  एक और सच्चाई से रु -ब - रु  करवाती हूँ .....


अखंड सौभाग्य


अखंड सौभाग्यवती रहो -रमा को दादी की आवाज सुनाई दी। यह तो उनके घर का रोज का क्रम था ,जब भी माँ पूजा करके माँ के पैर छूती दादी उन्हें रोज यही आशीष देती । तब रमा को इसका मतलब पता नहीँ था

ये भी प्रेम का ही रूप है और प्रेम का एक रूप  अगली ये  रचना भी है ......



हम दर्द की राह के राही थे  
था  खुशियों से  कहाँ नाता अपना ?
तुम बन के   मसीहा ना  मिलते   
 कब  सोया नसीब जग पाताअपना  ?
खिली  मन  की  मुरझाई   कलियाँ 
 हर  पल जैसे  मधुमास  हुआ !! 

 यूँ तो अभी फाल्गुन माह आने में बहुत समय है फिर भी मधुमास की बात हो और पलाश का खिलना न याद आये ये कैसे संभव है ? वैसे भी पलाश के फूल सबको ही आकर्षित करते होंगे ..... एक खूबसूरत रचना  पेशेनज़र है ..... 


पिघल रही सर्दियाँ
झरते वृक्षों के पात
निर्जन वन के दामन में
खिलने लगे पलाश 

इतनी सुन्दर रचनाओं के बाद भी कभी कभी ऐसा ही लगता है  कि न जाने क्यों कुछ लिखा नहीं जा रहा ........ और मन में एक ही बात आती है .... 



कर अवलोकन इतिहास सृष्टि का, 
दैहिक, दैविक, भौतिक दृष्टि का. 
काल, कल्प, कुल गाथा अनंत की,
सार, असार,सुर, असुर और संत की.
जीव जगत स्थावर जंगम
तत त्वम असि एवम सो अहम.

न जाने कलम क्यों जाती थम!

और इसके साथ ही मेरी कलम भी थक  कर थम रही है .......  वैसे भी पाठक भी पढ़ते हुए थक जाते होंगे ........फिर मुलाकात होगी अगले सोमवार यहीं इसी मंच पर ...... तब तक के लिए
नमस्कार 
संगीता स्वरुप 









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