सादर अभिवादन
कल सुबह अर्घ्य के साथ ही छठ पूजा सम्पन्न हो जाएगी
कल से थकी व अलसाई काया
हाथ-गोड़ दबाने वाले का शरीर भी
आलस से भर गया है....
सब हंसी ठठ्ठा कर के थकावट दूर कर रहे हैं
एक बड़ा परब और निकला
अब चलिए रचनाओं से मन बहलाइए
ऊब और विरक्ति का
दौर नहीं थमता
न कोई मंज़िल है
न कोई रास्ता ही है
न कोई लक्ष्य है
न कोई वास्ता ही है
न जाने कितने टुकड़ों में बटेगा ये चमन,
एक घर से हज़ार रंग के परचम निकले,
रंगीन पैबन्दों से उन्हें ख़्वाबों का गुमां है,
जिस्म पे मेरे बेशुमार दर्दो अलम निकले,
हंगामा क्यूं कर बरपा एक रोटी की चोरी पे,
शहर में न जाने कितने ही जरायम निकले,
कई कई सालों तक मेरी सुबहें अकुलाई हुई होती हूँ।
मैं उठती हूँ और घबराहट होती है।
दिल की धड़कन तेज रहती है।
आँखें थोड़ी थोड़ी नम।
इतने बड़े शहर बैंगलोर में इतनी तन्हाई कैसे है
जीवन नाम है परिवर्तन का
पल-पल संवरने और मन के जागरण का
उस प्रकाश में नज़र आता है
प्रेम का तंतु
जो वैसे छुपा रहता है !
नंदी जी का इस जगत को एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव के वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर ही होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखनी चाहिए ! तभी जीवन की सार्थकता है।
आज बस
सादर




