सादर अभिवादन
रूप चतुर्दशी
दिवाली से एक दिन पहले कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी नरक चतुर्दशी के रूप में मनाई जाती है। इसे छोटी दीवाली, नरक चौदस, रूप चौदस या रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण, मृत्यु के देवता यम एवं मां काली की पूजा का बहुत महत्व है। इस दिन स्नान करने से पहले अपने शरीर पर तेल की मालिश करना और उबटन लगाने का भी विधान है। इसी कारण इसे रूप चतुर्दशी भी कहते हैं।
इस दिन शाम को दीप जलाकर यमराज की पूजा की जाती है, जिनसे अकाल मृत्यु एवं नरक की यातनाओं के भय से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। यमराज हमें रोग, शोक या किसी भी प्रकार की दुर्घटना के भय से दूर रखें। पूजा के समय एक बेहतर स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
इस दिन शरीर पर तेल की मालिश करके नहाने का विधान है। मान्यता है की ऐसा करने वाला व्यक्ति खूबसूरत और जवान हो जाता है और त्वचा की रौनक बरकरार रहती है।
अब रचनाएँ.....
जिन वीरो को खोकर
हमनें पाई स्वतंत्रता ।
उनके बलिदान का
मंगल पर्व मनाना ।
हर दिन दीप एक मन में
वीरों के नाम का जलाना ।
दीपक,
तुमसे एक विनती है,
इस बार दिवाली में
कोई भेदभाव मत करना,
अट्टालिकाओं में ही नहीं,
झोपड़ियों में भी जलना.
अब कहां, आती है वो सदा!
रंग, नैनों से जुदा,
राह, खुद गए हैं मुकर,
ले चला कौन,
सदाओं से, वो दिवानापन!
सुतली बम की सुतली पर
कपड़ों में धूप लगेगी ।
टूटेगी, फिर-फिर टूटेगी
दस-दस गाँठ जुड़ेगी ॥
गिरते धूल-धूसरित कपड़े
बारम्बार धुलेंगे ॥
आज बस
सादर




