सादर अभिवादन
आज भाई रवीन्द्र जी नहीं हैं
वे रविवार को आएंगे
आज पढ़िए भूली-बिसरी रचननाएँ
अनुपस्थित से परस्पर संवाद है ।
ये सब क्या एक दिन की बात है ?
वाह रे ज़माने ! अजब रिवाज़ है ।
रोज़ आता है डाकिया बाँटता हुआ
चिट्ठियों में उम्मीद की अशर्फ़ियां ।
यूँ, रुक भी ना सकूं, इस मोड़ पर,
सफर के, इक लक्ष्य-विहीन छोड़ पर,
अक्सर, खुद को, रोकता हूँ,
अन्तहीन पथ पर, ठांव ढ़ूंढ़ता हूँ!
गाँव में होकर भी
बचपन वाला गाँव ढूढ़ते हैं|
वो पगडण्डी,
वो खेत और खलिहान ढूढ़ते हैं|
पिता,
मैं रोक सकता,
तो ज़रूर रोक लेता तुम्हें,
तुम गए,
तो न जाने क्या-क्या चला गया,
मेरा बचपन चला गया,
मेरी जवानी चली गई,
तुम गए,
तो मैं अचानक बूढ़ा हो गया.
शरद की स्वर्ण किरण बिखरी !
मन्द समीरण, शीतल सिहरन,
तनिक अरुण द्युति छाई,
रिमझिम में भीगी धरती,
यह चीर सुखाने आई,
लहरित शस्य-दुकूल हरित,
चंचल अचंल-पट धानी,
रमा ने महीने का हिसाब दिया।ये चार सौ रुपए काहे पर खर्च किए तूने??
जी वो मैं....बेटी के हेयर कलर पर...सब करते हैं तो उसे भी ...
सुनते ही एक जोर का चाँटा रमा के गाल गूंज उठा और महिला सशक्तीकरण का नारा उस गूँज में कहीं खो गया।
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आज करवा चौथ भी है
इस गीत के बिना अंक अधूरा है
आज बस
सादर





