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सोमवार, 8 अगस्त 2022

3479 / मैं नहीं लिखती इन दिनों कोई कविता .

 

नमस्कार ..... ! आज रविवार को पुनः मित्रता दिवस है ....... लगता है कि लोगों को बार बार  याद कराया जाता है  कि मित्रता  कितनी अहमियत रखती है जीवन में ......  लेकिन सच्चे मित्र में क्या क्या गुण होने चाहिए उसका एक जायजा लेते हैं इस रचना में .... 

दोस्त वही जो ढाल बने


उर से उर की तार मिले

दुख-सुख में सौ बार मिले 

दोस्त वही जो ढाल बने

दुश्मन के लिए तलवार बने.

जहाँ दोस्ती की बात होती है वहां हमारे मन मस्तिष्क में कुछ पौराणिक पात्रों के नाम आते हैं  , जैसे कृष्ण सुदामा ..... कृष्ण और  द्रौपदी ..... चीर हरण के समय जहाँ द्रौपदी के पतियों ने उसे चौसर  खेल में दांव पर लगा दिया था वहीँ कृष्ण ने उनकी लाज बचायी थी ..... और आज भी हर स्त्री याद करती है कृष्ण को  कि काश वो उनकी भी मदद करें .... 

यक्ष प्रश्न


गोविन्द शायद सुदूर स्वर्ग के 

प्रेक्षागृह की दर्शकदीर्घा में बैठे 

बेचैनी से पहलू बदल रहे हों 

लेकिन किसीका चीर बढ़ा कर 

उसकी लाज नहीं बचा पाते,

अब ये तो रहस्य ही है कि कृष्ण आखिर आते क्यों नहीं किसी की लाज बचाने ...... मुझे तो लगता है हर एक की ज़िन्दगी रहस्यों से भरी पड़ी है .....एक  उदाहरण देखिये ....

कुछ अनसुलझा सा ... 

न जाने कितने रहस्य हैं ब्रह्मांड में?
और
और न जाने
कितने रहस्य हैं मेरे भीतर??
क्या कोई जान पाया
या 
कोई जान पायेगा????

अब केवल यही नहीं है ....  ज़िन्दगी को देखने  सबका तरीका अलग अलग है ......लगता है  कि ज़िन्दगी पर सबसे ज्यादा चिंतन मनन हुआ होगा ..... एक बानगी और ...  इनके तो भीतर ही  अमावस  छा गयी है ...

अमावस


मैं अंजुरी में तड़प भरने लगी

सन्नाटे के 

छंद और चौपाइयां 

फुसफुसाने लगे

चाँद के अनगिनत 

टुकड़ों को समेटने लगी

एक सुरक्षित एकांत भरने लगी|

ओह ! कितनी हो गयीं न दर्द की बातें ..... वैसे दर्द न हो तो सुख का भी क्या पता चले ......  वैसे लोग तो ज़िन्दगी का फलसफा लिखते हैं ........ लेकिन आज मैंने पढ़ा उम्र का फलसफा ....... आप भी पढ़िए ...

फ़लसफा - लम्बी उम्र का ...


माँगता है इन्सान दुआ लम्बी उम्र की 
पर नहीं समझ पाता कौन सी उम्र  
 
ढल जाता है बचपन नासमझी में
बीत जाती है जवानी तय शुदा साँसों में


 आप बचपन और जवानी की बात कर रहे हैं  और एक स्त्री अपनी पूरी उम्र की दास्ताँ  सुना रही है .... 


जन्म दिया है तुमने,और पिता ने दिया है अंश,
पाला-पोसा मुझे भी,क्यों भाई सी नहीं हूँ वंश,
पराई है,कहा परिजनों ने,पर किसी ने न रोका?
पराया कह पाला मुझे,और किसी ने न टोका?

जहाँ रह रही हूँ माँ मैं,क्या ये घर मेरा नहीं है?
तो कौन सा है घर मेरा,क्या ये दर मेरा नहीं है?

अब ऐसे प्रश्न तो न जाने कब से चल रहे हैं और कब तक चलेंगे ....... लेकिन आज कल हम भारतीय  मना  रहे हैं  आज़ादी का अमृत महोत्सव ..... और इसको  मनाते  हुए  एक खूबसूरत रचना .....


ओ मेरे देश ! 

तेरे आँचल में जन्म लिया और 

तेरी हवाओं ने पाला हमको 

तेरी माटी में पले, खेले  

तेरी फ़िज़ाओं ने सम्भाला हमको !


इस महोत्सव के साथ ही बहुत से त्यौहार हम मानाने जा रहे हैं और त्यौहार पर मिठाई न हो तो सब अधूरा है .....तो लीजिये मिठाई के रूप में कमल खिलाईये और खाइए .....


बिना गैस जलाए बनाये काजू लोटस मिठाई

दोस्तो, रक्षा बंधन का त्यौहार आ रहा है। तो इस रक्षा बंधन पर बनाये बिना गैस जलाए काजू लोटस मिठाई। ये मिठाई बिना गैस जलाए,बिना मावा, बिना घी, बिना सूजी, बिना बेसन और बिना चाशनी के बनती है। शायद आप सोच रहे होंगे कि फ़िर ये मिठाई बनेगी कैसे ?

लीजिये मिठाई तो बन गयी .... अब आप अपनी सेहत के बारे में ....... अरे नहीं  अपने अपने पति  की सेहत के  बारे में थोडा ध्यान दें ...... 

"अगर आप स्वस्थ रहने के इच्छुक हैं तो योगा या रस्सा कूदने की ज़रूरत नहीं है। स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अच्छे पाकशास्त्री बनिये। घर में सिल-बट्टा और दरतिया ज़रूर रखिए। कैथा, मेथी दाना और नारियल की चटनी सिर्फ सिल-बट्टे से ही बन सकती है।"

उपरोक्त टिप्पणी किसी ने कहीं की थी ..... बाकी ज्ञान आप ब्लॉग पर पढ़ ही आये होंगे .... रही बात ज्ञान की तो आज ज्यादातर ज्ञान जीवन पर ही मिल रहा है ......अब इस रचना में नदी भी अपने जीवन की बात कह रही है .....


एक  नदी दूर से 
पत्थरों को तोड़ती रही 
और अपने देह से 
रेत को बहाती रही ...

और आगे बढ़ने के लिए  या आगे चलने के लिए  क्या सलाह है आप भी देखें .... 

धर बल, अगले पल चल जीवन



जो है प्रवर्तक्षण प्राप्त वही,

तन मन गतिमयता व्याप्त अभी,

गति ऊर्ध्व अधो अनुपात सधी,

आगत श्वासों का आलम्बन,

धर बलअगले पल चल जीवन।


आज कल ब्लॉग पर और फेसबुक पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है ...... बहुत सुन्दर लिखा जा रहा है ....... लेकिन फिर भी न जाने क्यों एक उदासी सी  छा  जाती है कभी कभी ....... और ऐसे ही लम्हों में कोई रच लेता है एक सच्चाई उजागर करती रचना .... 


मैं नहीं लिखती इन दिनों  कोई कविता .



ब्रेकअप,लिखने से मिलते है पुरस्कार 

"विरह गीत" लिखने पर 

शब्द उपहास से नजर आते हैं

सेन्टरी नेपकिन से जो मूल्य भर जाता है

लिखी हुई कविता  में 

"स्त्री तकलीफ "में वो दर्द कम कर जाते हैं

 सही कटाक्ष किया है ......... आज आज़ादी के ७५ वर्ष पूरे होने को हैं लेकिन आज भी हम भाषा के क्षेत्र में आज़ाद नहीं हो पाए ....... चलिए उम्मीद पर दुनिया कायम है ......   उम्मीद की बात चली है तो देखिए ज़रा  दोस्तों से  क्या उम्मीद की जा रही  है ....

दोस्त 

ऐ दोस्त

अबके जब आना न

तो ले आना हाथों में

थोड़ा सा बचपन

घर के पीछे बग़ीचे में खोद के

बो देंगे मिल कर


इसी के साथ आज की हलचल समाप्त करती हूँ ....... फिर मिलेंगे अगले सोमवार को कुछ नए  सूत्रों के साथ ........ नमस्कार 

जय हिन्द  

संगीता स्वरुप . 


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