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सोमवार, 30 नवंबर 2020

1961..सुख और दुःख एक सिक्के के दो पहलू हैं

सादर अभिवादन...
जा रहा है
कोई रोको
उसे पकड़ो
जाने न दो
बड़ा जिद्दी है ये
नवम्बर भी
फिसल रहा है 
हाथ से..
......
आज काफी शादियां हैं
चार ई-कार्ड आए हैं
कहते हैं आमंत्रण तो है
हम आपको स्वस्थ देखना जाहते हैं
घऱ से ही दुआएं दे दीजिए
.....
रचनाएँ देखें..



एक दिन ज़रूर आएगा,
वो अनागत प्रभात, 
जिसके आँचल में 
पुनः मुकुलित होंगे, 
आसन्न प्रजन्म के प्रसून,
उस दिगंत रेखा से 
फिर उभरेगा नव युग का 
सूरज अकस्मात,





महारजत के वसन अनोखे 
दप दप दमके कुंदन काया
आधे घूंघट चन्द्र चमकता
अप्सरा सी ओ महा माया
कणन कणन पग बाजे घुंघरु
सलिला बन कल कल लहराई।।





गुजरते हैं सुखों के क्षण
दुखों के पल गुजर जाते
समय की तय है सीमायें
सदा वो पल नहीं रहते....
गमों से जो नहीं डरते
सुखों में भी वही जीते
नहीं तो दर्द-पीड़ा-गम
मन झकझोर देते हैं....




सुख और दुःख 
एक सिक्के के दो पहलू हैं। 
पर विडम्बना ये है कि 
कभी कभी हमारे हिस्से 
वो सिक्का आता है 
जिसके दोनों पहलू में 
दुःख ही छिपे होते हैं।


धरती पर नीला समंदर 
ऊपर नील गगन है

सच्चे साथी की खोज में
धुँआ - धुँआ सा मन है।

इठलाता पवन, झूमे तरु 
रत्नाकर हो रहा मगन है
बैठे रहें प्रिय के संग 
यही चाहता मन है।

फिर मिलते हैं
सादर

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