सादर अभिवादन।
मंगलवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।
ख़ुशबू गुलिस्ताँ को
नाराज़ करती हुई
स्याह सायों में समा गई,
ज़िंदगी के अँधेरे-उजाले पल
ऊबकर उलझ गए हैं
दिल की आज़ाद धड़कन
अलक्षित वन में भटक गई।
-रवीन्द्र
आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

लगता है-
भ्रम वश या द्वेष वश
किसी ने यों ही धकिया दिया होऊँगा
या कभी खा गया होऊँगा ठोकर-
बेखुदी में और गिर गया होऊँगा।

खुद
को
यूँ
गंवाते
थे।
मृग
मरीचिका
की
माया
में
कोई
अपना
नहीं
बनाते
थे।

मुझे अंदर कुछ चोक होता सा लगा. खिड़की से बाहर देखा धूप बहुत थी...मुझे तुम याद आए. तुम्हारी किताब खोलकर बैठ गई पर यहाँ तो भीतर से भी ज़्यादा दर्द है. सच मुझे बहुत दर्द हो रहा था. पूरी रात मौसम के बदलते तेवर से लड़ती रही. आज 24 घण्टे बाद बहुत हिम्मत जुटाकर तुमसे आग्रह किया और तुमने उन्मुक्त होकर रंग बिखेर दिए शब्दों के. आज बहुत दिनों के बाद मेरा कमरा रोशनी से भर गया.
तुम्हें पता है एन्टी डिप्रेशन हो तुम मेरे.
इस बदलते दौर में
जीवन विकटता से भरा
हर पल गुजरते दिन के संग
एक नई उलझन आ रही
हर रोज एक नया सबक
हमको है ये सिखला रही

तनाव के उन क्षणों में मजबूत लोग भी आत्महत्या कर लेते हैं..
वो लोग जिनके पास सब कुछ है
शान ... शौकत ... रुतबा ... पैसा .. इज्जत
इनमें से कुछ भी उन्हें नहीं रोक पाता ..
एक अदद दोस्त की .....
कमी होती है उस मुकाम पर
एक अदद राजदार की .....
हम-क़दम के अगले अंक का विषय-
'प्रतीक्षा'
इस विषय पर सृजित आप अपनी रचना आगामी शनिवार (20 जून 2020) तक कॉन्टैक्ट फ़ॉर्म के माध्यम से हमें भेजिएगा।
चयनित रचनाओं को आगामी सोमवारीय प्रस्तुति (22 जून 2020) में प्रकाशित किया जाएगा।
उदाहरणस्वरूप कविवर
डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी की कविता-
प्रतीक्षा
हरिवंश राय बच्चन | |
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