स्वतंत्र..
ऐसा कोई भी नहीं जिसे स्वतंत्रता का मतलब ज्ञात न हो
हर गुलाम यह जानता है कि हम स्वतंत्र नहीं है
इस समूचे भारत मे कोई बिरला ही होगा
जो स्वतंत्र हो
........
ऐसा कोई भी नहीं जिसे स्वतंत्रता का मतलब ज्ञात न हो
हर गुलाम यह जानता है कि हम स्वतंत्र नहीं है
इस समूचे भारत मे कोई बिरला ही होगा
जो स्वतंत्र हो
........
आज की शुरुआत कालजयी रचनाओं से
आदरणीय उर्मिलेश जी
स्वतंत्रता का अर्थ है कि हम स्वतंत्र स्वर बनें
जहाँ हो मौन दासता वहाँ सदा मुखर बनें
स्वतंत्रता के तीर्थ की सदैव हम डगर बने
सजीव स्वाभिमान से जियें सदा निडर बनें
यही हमारा लक्ष्य हो
स्वतंत्र हर मनुष्य हो
परन्तु हर मनुष्य में मनुष्यता बनी रहे!
आदरणीय डॉ. सुशील कुमार जोशी
गुलाम के इशारे पर चलता है
स्वतंत्र
एक शब्द है
स्वतंत्रता
एक
ख्वाब है
गुलाम
और
गुलामी
आम है
और
खास है
नकारते रहिये
हो गये
तो
आदरणीय हिमांशु डबराल
‘क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है?
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है’
धूमिल की ये पंक्तियाँ आज भी ज़हन में कई सवाल छोड़ जाती….आज़ादी…हम आज़ाद है, ये कहने पर एक बंधू बोल पड़े – क्यों मजाक करते हो भाई? सच में कई बार मजाक ही लगता है
आदरणीय राजेश चेतन
अंग्रेज़ी को छोड़
जिस दिन गूंजेगा
हिन्दुस्तानी मंत्र
उस दिन हम होंगे
'स्वतंत्र'!
आदरणीय जी सी चतुर्वेदी
स्वतंत्रता जीवन के अंदाज को बदल देती है। जो एक अलग संस्कृति को जन्म देती है। स्वतंत्रता का अभिमान या वैचारिक दुरपयोग बिभिन्न संस्कृतियों में सामंजस्य स्थापित नहीं होने देते ,और स्वतंत्रता सामाजिक हाजमे को ख़राब करना शुरू कर देता है। अब इस स्वतंत्रता के खतरे के रूप में हमें सामना करना पड़ता है
आदरणीय शक्ति प्रकाश जी
आलोचना, निंदा से भर्त्सना तक
गालियों, थप्पड़ों से जूतों तक
सब आपके ही अधिकार हैं श्रीमान
क्योंकि आप जनतांत्रिक बहुमत हैं
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो निश्चित
पाई जाएगी, कुछ कोटरों में
आदरणीय सुखविंद्र सिंह मनसीरत
नभचर उड़ना तक थे भूले
जब से झूले बांहों के झूले
कितना सुन्दर राग थे गाते
स्वतंत्र नभ में थे चहचहाते
विचरण कर दाना थे चुगते
कलरव कर आसमां उठाते
नियमित रचनाएँ
...................
आदरणीय आशा सक्सेना
स्वतंत्रता

हुई स्वतंत्र अब आत्मा
जन्म मरण से हुई मुक्त
अब बंधक नहीं शरीर की
असीम प्रसन्नता हुई आज |
वह बंधन नहीं चाहती
आदरणीय साधना वैद
अब तो जागो ....

अब तो जागो
तुम भी स्वतंत्र हो
औरों की ही तरह खुद को
तलाशने के लिये
सँवारने के लिये
निखारने के लिये
स्थापित करने के लिये !
आदरणीय उर्मिला सिंह
स्वतन्त्र हैं हम .....
बच्चे हैं तो क्या हुआ, स्वतंत्र हैं --हम
मां बाप का कहना क्यों माने.....
अपनी मर्जी के मालिक हैं -- हम
हमें पालना जिम्मेदारी है उनकी...
आखिर बच्चे तो उनके ही हैं --हम।
आदरणीय शुभा मेहता
स्वतंत्र ...
बडे गर्व से
कहते हैं.हाँ हैं हम
स्वतंत्र देश के
स्वतंत्र नागरिक ..
और हैं भी ....।
पर हमनें तो
इसका ऐसा
किया दुरूपयोग ..
सारी प्रकृति दर्द से
कराह उठी ..
आदरणीय सुशील भैय्या
पहली बार आज के विशेषांक मे शामिल

नेता
घर बैठ
चुनावी रैलियाँ
बन्द सारे
दिमागों में
बो रहा था
‘उलूक’
गुलामी
सुनी सुनाई बात है
लगभग
सत्तर साल की
महसूस कर
बेवकूफ
स्वतंत्र तो
तू अभी
कुछ साल
पहले ही से
हो रहा था।
आदरणीय अनीता सैनी
स्वतंत्र चित्त से ...

उल्लास से कहता उजाले की दहलीज़ पर।
स्वतंत्र चित्त से जीवन की उस ढलान पर।
झोली फैलाए याचक याचना की उम्मीद पर।
आँखों की झपकी भर अस्मिता उधार माँगता।
आदरणीया अभिलाषा चौहान
स्वतंत्र हूँँ मैैंं
प्रकृति ,
मेरे हाथों का खिलौना है
खेल सकता हूँ मनचाहे खेल।
मुझे पसंद हैं
वो पहाड़ जो मैंने स्वयं
निर्मित किए हैं कूड़े के ढेर से।
साफ-सफाई मुझे कहां भाती है।
पक्षियों के नीड़ो में
मेरा ही बसेरा है
आदरणीय सुजाता प्रिया
स्वतंत्र रूप को नमन ..
स्वतंत्र अपना भाव हो ,
स्वतंत्र मन की चेतना।
स्वतंत्र ही विचार हो ,
स्वतंत्र हो् सेवा-साधना।
स्वतंत्र परोपकार हो,
स्वतंत्र भाव लिए हो मन।
सृष्टि के रचनाकार के ,
स्वतंत्र रूप को नमन।
आदरणीय सुबोध सिन्हा
बस यूँ ही

कभी लुटेरों ने दिया ज़ख़्म
तो कभी मिली ग़ुलामी की चोट
कभी बँटवारे का छाया मातम
तो कभी जनरक्षकों की लूट खसोट
गणतंत्र है फिर भी अपने भारत में आज
हम भी तो हैं स्वतंत्र आज मेरे भाई
आदरणीय सुबोध सिन्हा
दायरे की त्रिज्या ...

"जमूरे!, श्वान भी भला स्वतंत्र होता कहाँ, हो वो पालतू या गली का,
गली वाले का तय होता है मुहल्ला, इंसानों के राज्य या देश के जैसा।
पालतू के गले का सिक्कड़ या पट्टा होता है, उसके दायरे की त्रिज्या,
ठीक जैसे जन्म से पहले ही, माँ के गर्भ ही में दिया जाता है पहना,
गले में इंसान के धर्म, जाति-उपजाति का अनचाहा अदृश्य एक पट्टा।
दुनिया में आने से पहले नौ माह तक कैद था, तू अपनी माँ के गर्भ में,
आने से पहले ही धरती पर, बन गया परतंत्र जाति-धर्म के सन्दर्भ में।"
....
आज बस
कल का अंक देखिए नए विषय के लिए
आ रहे हैं भाई रवीन्द्र जी
एक सै चौबीसवाँ विषय लेकर
सादर
नियमित रचनाएँ
...................
आदरणीय आशा सक्सेना
स्वतंत्रता

हुई स्वतंत्र अब आत्मा
जन्म मरण से हुई मुक्त
अब बंधक नहीं शरीर की
असीम प्रसन्नता हुई आज |
वह बंधन नहीं चाहती
आदरणीय साधना वैद
अब तो जागो ....

अब तो जागो
तुम भी स्वतंत्र हो
औरों की ही तरह खुद को
तलाशने के लिये
सँवारने के लिये
निखारने के लिये
स्थापित करने के लिये !
आदरणीय उर्मिला सिंह
स्वतन्त्र हैं हम .....
बच्चे हैं तो क्या हुआ, स्वतंत्र हैं --हम
मां बाप का कहना क्यों माने.....
अपनी मर्जी के मालिक हैं -- हम
हमें पालना जिम्मेदारी है उनकी...
आखिर बच्चे तो उनके ही हैं --हम।
आदरणीय शुभा मेहता
स्वतंत्र ...
बडे गर्व से
कहते हैं.हाँ हैं हम
स्वतंत्र देश के
स्वतंत्र नागरिक ..
और हैं भी ....।
पर हमनें तो
इसका ऐसा
किया दुरूपयोग ..
सारी प्रकृति दर्द से
कराह उठी ..
आदरणीय सुशील भैय्या
पहली बार आज के विशेषांक मे शामिल

नेता
घर बैठ
चुनावी रैलियाँ
बन्द सारे
दिमागों में
बो रहा था
‘उलूक’
गुलामी
सुनी सुनाई बात है
लगभग
सत्तर साल की
महसूस कर
बेवकूफ
स्वतंत्र तो
तू अभी
कुछ साल
पहले ही से
हो रहा था।
आदरणीय अनीता सैनी
स्वतंत्र चित्त से ...

उल्लास से कहता उजाले की दहलीज़ पर।
स्वतंत्र चित्त से जीवन की उस ढलान पर।
झोली फैलाए याचक याचना की उम्मीद पर।
आँखों की झपकी भर अस्मिता उधार माँगता।
आदरणीया अभिलाषा चौहान
स्वतंत्र हूँँ मैैंं
प्रकृति ,
मेरे हाथों का खिलौना है
खेल सकता हूँ मनचाहे खेल।
मुझे पसंद हैं
वो पहाड़ जो मैंने स्वयं
निर्मित किए हैं कूड़े के ढेर से।
साफ-सफाई मुझे कहां भाती है।
पक्षियों के नीड़ो में
मेरा ही बसेरा है
आदरणीय सुजाता प्रिया
स्वतंत्र रूप को नमन ..
स्वतंत्र अपना भाव हो ,
स्वतंत्र मन की चेतना।
स्वतंत्र ही विचार हो ,
स्वतंत्र हो् सेवा-साधना।
स्वतंत्र परोपकार हो,
स्वतंत्र भाव लिए हो मन।
सृष्टि के रचनाकार के ,
स्वतंत्र रूप को नमन।
आदरणीय सुबोध सिन्हा
बस यूँ ही

कभी लुटेरों ने दिया ज़ख़्म
तो कभी मिली ग़ुलामी की चोट
कभी बँटवारे का छाया मातम
तो कभी जनरक्षकों की लूट खसोट
गणतंत्र है फिर भी अपने भारत में आज
हम भी तो हैं स्वतंत्र आज मेरे भाई
आदरणीय सुबोध सिन्हा
दायरे की त्रिज्या ...

"जमूरे!, श्वान भी भला स्वतंत्र होता कहाँ, हो वो पालतू या गली का,
गली वाले का तय होता है मुहल्ला, इंसानों के राज्य या देश के जैसा।
पालतू के गले का सिक्कड़ या पट्टा होता है, उसके दायरे की त्रिज्या,
ठीक जैसे जन्म से पहले ही, माँ के गर्भ ही में दिया जाता है पहना,
गले में इंसान के धर्म, जाति-उपजाति का अनचाहा अदृश्य एक पट्टा।
दुनिया में आने से पहले नौ माह तक कैद था, तू अपनी माँ के गर्भ में,
आने से पहले ही धरती पर, बन गया परतंत्र जाति-धर्म के सन्दर्भ में।"
....
आज बस
कल का अंक देखिए नए विषय के लिए
आ रहे हैं भाई रवीन्द्र जी
एक सै चौबीसवाँ विषय लेकर
सादर


