स्नेहिल अभिवादन....
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★★★★★★
गुलमोहर के खूबसूरत रंग जुटाने के लिए
आदरणीया यशोदा दी
★★★★★★
गुलमोहर के खूबसूरत रंग जुटाने के लिए
आदरणीया यशोदा दी
का हृदयतल से विशेष आभार।
---
गुलमोहर के विषय में मैं क्या कहूँ
बस इतना ही-
आप गुलमोहर के रंग को, उसके मनमोहक छाँव को,उसकी नरम पत्तियों को,कलियों ,दिलकश फूलों को अगर महसूस करना चाहते हैं तो
हमारे रचनाकारों की रची अद्भुत और अनमोल कृतियाँ
अवश्य पढ़े।
एक मंच पर एक विषय में अलग-अलग दृष्टिकोण
पढ़ना निःसंदेह विस्मयकारी है।
तो चलिए चलें
गुलमोहर की यात्रा पर।
★★★★★
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गुलमोहर के विषय में मैं क्या कहूँ
बस इतना ही-
आप गुलमोहर के रंग को, उसके मनमोहक छाँव को,उसकी नरम पत्तियों को,कलियों ,दिलकश फूलों को अगर महसूस करना चाहते हैं तो
हमारे रचनाकारों की रची अद्भुत और अनमोल कृतियाँ
अवश्य पढ़े।
एक मंच पर एक विषय में अलग-अलग दृष्टिकोण
पढ़ना निःसंदेह विस्मयकारी है।
तो चलिए चलें
गुलमोहर की यात्रा पर।
★★★★★
आज के अंक की खासियत..
पहली बार वेबदुनिया से
पहली बार वेबदुनिया से
फाल्गुनी जी (स्मृति आदित्य पाण्डेय) का
आलेख आपके समक्ष..
सुनो, गुलमोहर, तुम जिंदा हो...
'क्यों मेरे केसरिया रूप पर शब्दों के अर्घ्य चढ़ाती हो?
सूर्य नहीं, गुलमोहर हूं मैं क्यों मुझसे प्रीत बढ़ाती हो?
आओ, देखें, शहद-चांदनी को चांद पर कुछ बातें गूंथें?
शीतलता के सौम्य उजास में क्यों कच्चे दीप जलाती हो?
मुझे क्षमा कर देना, गुलमोहर। मैं तुम्हें बचा नहीं सकी। किसे दोष दूं अपनी विवशता का? मेरी आंखों के सामने तुम बेरहमी से काट दिए गए और मैं कुछ न कर सकी। हजारों केसरिया पीले पुष्पों से लकदक तुम्हारी सुपुष्ट बाहें काटी गईं, मजबूत शरीर पर निर्मम प्रहार किए गए और फिर, बस कुछ ही पलों में तुम्हारा समूचा अस्तित्व धराशायी हो गया और मैं? मैं, अपनी ही लाचारी के दायरे में सिमटी छलछलाए नेत्रों से तुम्हें देखती रही। अब भी मेरे कलेजे में तुम्हारी आत्मा कांप रही है। तुम पर पड़ने वाली कुल्हाड़ी की हर मार मुझे लहूलुहान कर रही है और मैं अपनी अशक्तता को कोसते हुए तुम्हारी स्मृतियों की किरचें समेट रही हूं।
★★★★★
आदरणीया सीमा सिंघल जी
माँ, तुलसी और गुलमोहर ...
माँ कहती थी
आँगन के एक कोने में तुलसी
और दूसरे में गुलमोहर हो
तो मन से बसंत कभी नहीं जाता
तपती धूप में भी
खिलखिलाता गुलमोहर जैसे
कह उठता हो कुछ पल गुजारो तो सही
मेरे सानिध्य में
★★★★★
आदरणीया साधना वैद जी की लिखी
दो रचनाएँ
★
ज़िंदगी चलती रही ...
हर जगह, हर मोड़, पर इंसान ठहरा ही रहा,
वक्त की रफ़्तार के संग ज़िंदगी चलती रही !
खुशनुमां वो गुलमोहर की धूप छाँही जालियाँ
चाँदनी, चम्पा, चमेली की थिरकती डालियाँ
पात झरते ही रहे हर बार सुख की शाख से
मौसमों की बाँह थामे ज़िंदगी चलती रही !
★★
गुलमोहर – मेरा आइना

मेरे सबसे अच्छे दोस्त
मेरे हमदम, मेरे हमराज़,
मेरे हमनवां, मेरे हमखयाल,
मेरे प्यारे गुलमोहर
हैरान हूँ कि कैसे तुम्हें
मेरे दिल के हर जज़्बात की
खबर हो जाती है
आदरणीया विभारानी श्रीवास्तव जी
गुलमोहर
बच्चों का बड़ा होना
अब खलने लगा है
मन उबने लगा है
शतरंज खेलना और पेंच लगाना
गुलमोहर के गुल से
नाजुक शाखाओं का
जरा तेज हवा चली कि विछोह निश्चित
महबूब को मानों खजाना मिल जाता था
★★★★★
आदरणीय कुसुम कोठारी जी
कहो तो गुलमोहर
आदरणीया अनीता सैनी जी
गुलमोहर बन मुस्कुराये...

सुरसरी सी शीतल लहरी
प्रज्ज्वलित दीप प्रीत
मधुर आँच में प्रेम जला, विरह तीव्र मशाल
खिला गुलमोहर यादों का प्रीत बनी मन मीत
अनंत पथ पर चले कर्म
जीवन जलती धूप
साथ तुम्हारा गुलमोहरी छाया
फूल यादों का रूप |
आदरणीया अभिलाषा चौहान जी
जब मुस्काता है गुलमोहर ....

गर्मियों के तपते दिन ,
लाल फूलों से लदा गुलमोहर।
हर लेता है मन का संताप,
चटकती बिखरी तेज धूप में,
खिलखिला उठता है मन।
देख उसे लगता है ऐसे,
जैसे किशोरी पर आया यौवन।
★★★★★
आदरणीया आशा सक्सेना जी
गुलमोहर
कच्ची सड़क के दोनो ओर गुलमोहर के वृक्ष लगे
देते छाँव दोपहर में करते बचाव धुप से
धरा से हो कर परावर्तित आदित्य की किरणे
मिल कर आतीं हरे भरे पत्तों से
खिले फूल लाल लाल देख
ज्यों ही गर्मीं बढ़ती जाती
चिचिलाती धुप में नव पल्लव मखमली अहसास देते
चमकते ऐसे जैसे हों तेल में तरबतर
फूलों से लदी डालियाँ झूल कर अटखेलियाँ करतीं
मंद मंद चलती पवन से
★★★★★
आदरणीया शुभा मेहता जी
गुलमोहर
सडक के उस पार
गली के छोर पर
हुआ करते थे
दो गुलमोहर ...
बडे़ मनोहर लगते थे मुझे
जब लद जाया करते थे
फूलों से .....
एक केसरी
और दूसरा पीला
★★★★★
आदरणीया अनुराधा जी
गुलमोहर की व्यथा
आशान्वित हुआ फिर गुलमोहर
और चलते-चलते बेहद
खूबसूरत सृजन पढ़िये
आदरणीया मीना शर्मा जी
की लेखनी से-
तब गुलमोहर खिलता है
आज का हमक़दम आपको कैसा लगा
कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के माध्यम
से अवगत कराने का
कष्ट करें।
हमक़दम का नया विषय लेकर आ रही हैं
कल यशोदा दी।
कृपया कल का अंक पढ़ना न भूले।
★★★
बसंत झरकर पीपल से
जब राहों में बिछ जाता है
दूब के होंठ जलने लग जाते
तब गुलमोहर मुस्काता है
धूप संटियाँ मारे गुस्से से
स्वेद हाँफता छाँव को तरसे
दिन अजगर-सा अलसाता है
तब गुलमोहर मुस्काता है
#श्वेता सिन्हा
सुनो, गुलमोहर, तुम जिंदा हो...
'क्यों मेरे केसरिया रूप पर शब्दों के अर्घ्य चढ़ाती हो?
सूर्य नहीं, गुलमोहर हूं मैं क्यों मुझसे प्रीत बढ़ाती हो?
आओ, देखें, शहद-चांदनी को चांद पर कुछ बातें गूंथें?
शीतलता के सौम्य उजास में क्यों कच्चे दीप जलाती हो?
★★★★★
आदरणीया सीमा सिंघल जी
माँ, तुलसी और गुलमोहर ...
माँ कहती थी
आँगन के एक कोने में तुलसी
और दूसरे में गुलमोहर हो
तो मन से बसंत कभी नहीं जाता
तपती धूप में भी
खिलखिलाता गुलमोहर जैसे
कह उठता हो कुछ पल गुजारो तो सही
मेरे सानिध्य में
★★★★★
आदरणीया साधना वैद जी की लिखी
दो रचनाएँ
★
ज़िंदगी चलती रही ...
हर जगह, हर मोड़, पर इंसान ठहरा ही रहा,
वक्त की रफ़्तार के संग ज़िंदगी चलती रही !
खुशनुमां वो गुलमोहर की धूप छाँही जालियाँ
चाँदनी, चम्पा, चमेली की थिरकती डालियाँ
पात झरते ही रहे हर बार सुख की शाख से
मौसमों की बाँह थामे ज़िंदगी चलती रही !
★★
गुलमोहर – मेरा आइना

मेरे सबसे अच्छे दोस्त
मेरे हमदम, मेरे हमराज़,
मेरे हमनवां, मेरे हमखयाल,
मेरे प्यारे गुलमोहर
हैरान हूँ कि कैसे तुम्हें
मेरे दिल के हर जज़्बात की
खबर हो जाती है
★★★★★★
आदरणीया विभारानी श्रीवास्तव जी
गुलमोहर
बच्चों का बड़ा होना
अब खलने लगा है
मन उबने लगा है
शतरंज खेलना और पेंच लगाना
गुलमोहर के गुल से
नाजुक शाखाओं का
जरा तेज हवा चली कि विछोह निश्चित
महबूब को मानों खजाना मिल जाता था
★★★★★
आदरणीय कुसुम कोठारी जी
कहो तो गुलमोहर
रंगत से अपनी सूरज से
तुम होड़ लेते रहते हो
गर्मी से लड़ने को सुर्खरु
तमतमाऐ से रहते हो।
मस्त हो इतराते रहते हो
गुनगुनाते गीत गाते हो
झूम झूम लहरा कर
पाखियों को न्योता देते हो।
★★★★★आदरणीया अनीता सैनी जी
गुलमोहर बन मुस्कुराये...

सुरसरी सी शीतल लहरी
प्रज्ज्वलित दीप प्रीत
मधुर आँच में प्रेम जला, विरह तीव्र मशाल
खिला गुलमोहर यादों का प्रीत बनी मन मीत
अनंत पथ पर चले कर्म
जीवन जलती धूप
साथ तुम्हारा गुलमोहरी छाया
फूल यादों का रूप |
★★★★★
आदरणीया अभिलाषा चौहान जी
जब मुस्काता है गुलमोहर ....

गर्मियों के तपते दिन ,
लाल फूलों से लदा गुलमोहर।
हर लेता है मन का संताप,
चटकती बिखरी तेज धूप में,
खिलखिला उठता है मन।
देख उसे लगता है ऐसे,
जैसे किशोरी पर आया यौवन।
★★★★★
आदरणीया आशा सक्सेना जी
गुलमोहर
कच्ची सड़क के दोनो ओर गुलमोहर के वृक्ष लगे
देते छाँव दोपहर में करते बचाव धुप से
धरा से हो कर परावर्तित आदित्य की किरणे
मिल कर आतीं हरे भरे पत्तों से
खिले फूल लाल लाल देख
ज्यों ही गर्मीं बढ़ती जाती
चिचिलाती धुप में नव पल्लव मखमली अहसास देते
चमकते ऐसे जैसे हों तेल में तरबतर
फूलों से लदी डालियाँ झूल कर अटखेलियाँ करतीं
मंद मंद चलती पवन से
★★★★★
आदरणीया शुभा मेहता जी
गुलमोहर
सडक के उस पार
गली के छोर पर
हुआ करते थे
दो गुलमोहर ...
बडे़ मनोहर लगते थे मुझे
जब लद जाया करते थे
फूलों से .....
एक केसरी
और दूसरा पीला
★★★★★
आदरणीया अनुराधा जी
गुलमोहर की व्यथा
बरसों से एक ही भाव लिए
बिन फूलों का श्रृंगार किए
क्यों बदले हैं तेवर तेरे
नहीं खिलते अब फूल घनेरे
किस बात की व्याकुलता लिए
खड़े मखमली छाँव लिए
हरियाली का साथ न छोड़ा
★★★★★
आदरणीया सुधा देवरानी जीआशान्वित हुआ फिर गुलमोहर
खुशियों की दोपहर अभी ढली नहीं कि -
दुख का अंधकार तूफान बनकर ढा गया,
बेचारे गुलमोहर पे....
लाख जतन के बाद भी---
ना बचा पाया अपनी खूबसूरत शाखा,
भंयकर तूफान से.......
अधरों की वह मुस्कुराहट अधूरी सी ,
रह गयी.....
जब बडी सी शाखा टूटकर जमीं पर ,
ढह गयी...........
★★★★★★और चलते-चलते बेहद
खूबसूरत सृजन पढ़िये
आदरणीया मीना शर्मा जी
की लेखनी से-
तब गुलमोहर खिलता है
जिद्दी बच्चे सी मचल हवा,
पैरों से धूल उड़ाती है,
तरुओं के तृषित शरीरों से,
लिपटी बेलें अकुलाती हैं,
जब वारिद की विरहाग्नि में,
धरती का तन मन जलता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!
★★★★★
आज का हमक़दम आपको कैसा लगा
कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के माध्यम
से अवगत कराने का
कष्ट करें।
हमक़दम का नया विषय लेकर आ रही हैं
कल यशोदा दी।
कृपया कल का अंक पढ़ना न भूले।
★★★
बसंत झरकर पीपल से
जब राहों में बिछ जाता है
दूब के होंठ जलने लग जाते
तब गुलमोहर मुस्काता है
धूप संटियाँ मारे गुस्से से
स्वेद हाँफता छाँव को तरसे
दिन अजगर-सा अलसाता है
तब गुलमोहर मुस्काता है
#श्वेता सिन्हा









