।।प्रातः वंदन।।
प्रिय यामिनी जागी।
अलस पंकज-दृग अरुण-मुख
तरुण-अनुरागी।
खुले केश अशेष शोभा भर रहे,
पृष्ठ-ग्रीवा-बाहु-उर पर तर रहे,
बादलों में घिर अपर दिनकर रहे,
ज्योति की तन्वी, तड़ित-
द्युति ने क्षमा माँगी..!!
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
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आज शुरुआत अमित मिश्रा जी की खूबसूरत रचना जो सारगर्भिता से परिपूर्ण है..जरूर पढ़ें✍
जो वक़्त की बिसात पे
तू हौसले बिछाएगा
फ़लक नही है दूर फिर
सितारे तोड़ लाएगा
आँधियों के वेग में
अडिग खड़ा रहा अगर..
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पंकज प्रियम जी की भावाभिव्यक्ति..
तू किसी और के जो अब पास है
मेरा मन इसलिए बहुत उदास है।
देख लेना झांक कर तुम अंदर
दिल मेरा भी तुम्हारे ही पास है।
तेरा दावा की नूर छीन लिया मैंने
मेरा भी चैन तुम्हारे आसपास है।..
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आदरणीय अजित गुप्ता जी के
समसामायिक विषय पर विचार
समसामायिक विषय पर विचार
एक जमाना था जब अंगुली पर स्याही का निशान लगने पर मिटाने की जल्दी रहती थी लेकिन एक जमाना यह भी है कि अंगुली मचल रही है, चुनावी स्याही का निशान लगाने को! कल उदयपुर में वोट पड़ेंगे, तब जाकर कहीं अंगुली पर स्याही का पवित्र निशान लगेगा। देश में लोकतंत्र है, इसी बात का तो सबूत है यह निशान! सदियों से मानवता लोकतंत्र के लिये तड़पी है..
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संस्कारों का पहन गहना
बड़ी शान से चलने लगी
समेटे होठों की मुस्कान
गीत प्रीत के गाने लगी
इंतज़ार में सिमटते दिन
वही रात गुजरने लगी
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अब मैं कुसुम कोठारी जी की रचना के साथ थमती हूँ
शीर्षक है..
निशिगंधा की भीनी
मदहोश करती सौरभ
चांदनी का रेशमी
उजला वसन
आल्हादित करता
मायावी सा मौसम
फिर झील का अरविंद
उदास गमगीन क्यों
सूरज की चाहत
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..



