सादर अभिवादन।
हैं
हैं
खिले
सेमल
आजकल
ख़ुश-गवार
रंगीला मौसम
छायी छटा बसंत।
-रवीन्द्र
आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

बादलों में बूँद सी
आत्मा संसार में
पुष्प में सुगन्ध सी
व्याप्त है ब्रम्हाण्ड में

कब कदंब की डाल बैठकर
मुरली मधुर सुनाओगे
विरह की मारी सभी गोपियाँ
सुध-बुध भूल गई हैं
अब तो होली भी आ गई कान्हा....
आकर रास रचा जाओ
कब आओगे ......।

कसक बहुत रही है आज ।
जो तोड़ ना सके थे कायर हाथ ।
उन बीते दिनों के अनचाहे ...
बंधनों की झूठी लाज ।।
साईकल की उतरी हुई चेन
और हाथों में सनी ग्रीस के निशान भेजे हैं
तुम्हारे पीछे भागने की मेरी इच्छा
और तुम्हारे ढूँढने पर छुप जाने के
शरारती खेल भेजे हैं

‘राजनीति में कुछ सुनिश्चित नहीं होता- चालें ही अगली चालों की भूमिका बनती हैं’ (पृष्ठ-158). और दूसरा कथन भी तिवारीजी का ही है, जब मुद्दा खडा करने की राजनीतिक फितरत से आगे जाकर विनोद मुद्दे को हल करने के सीधे उपाय बना-बताकर मंच से उतर चुका है और प्रेस के साथ बातचीत होनी बाकी है – ‘कुछ मिल सकता है तुम्हारी बिरादरी को, तो सरकार से ही- हमारी सरकार से. और ये घर-वापसी के दिमांगी फितूर से क्या मतलब है तुम्हारा? एक गुमशुदा की तलाश तक तो कानून-व्यवस्था कर नहीं पाती- मिल पाती है पटरी पर पडी उसकी लावारिस लाश. उसे भी लावारिस मुर्दे की तरह फूँक-फाँक फेंक देती है पुलिस’ (पृष्ठ-190). और यही हुआ विनोद के साथ, क्योंकि प्रेस से बातचीत में भी उसने वही किया- किन्नरों को भीड व मुद्दा बनाकर रखने के बदले सचमुच ही उनके निस्तार का काम.... और फिर हो गया उसी का काम तमाम.....
हम-क़दम का नया विषय
आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
रवीन्द्र सिंह यादव