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सोमवार, 26 नवंबर 2018

1228...हम-क़दम का छियांलिसवाँ क़दम...


हिमांशु जोशी (४ मई १९३५ - २३ नवम्बर २०१८) 
हिन्दी के ख्यातिलब्ध कहानीकारउपन्यासकार और पत्रकार थे। उन्होंने 
अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की थी। वे लंबे समय 
तक हिंदी पत्रिका 'कादम्बिनी' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के संपादन 
से जुड़े रहे। बाद के दिनों में उन्होंने 'वागर्थ' के संपादन का भी दायित्व संभाला। देहावसान से कुछ समय पूर्व तक वे नार्वे से प्रकाशित 
पत्रिका 'शांतिदूत' के सलाहकार संपादक रहे। 
हिंदी के मशहूर कथाकार हिमांशु जोशी का निधन हो गया. उनके निधन के साथ ही पहाड़ के लेखकों की बेहद स्थापित पीढ़ी में से एक और नाम कम हो गया. हिमांशु, मानव संवेदनाओं के लेखक थे. उनके उपन्यास और कहानियां, कहानी होते हुए भी सच लगती हैं.  त्याग, तपश्चर्या, विस्थापन, परिवार, करुणा, संघर्ष, शोषण, स्नेह, वासना, तिरस्कार के कई रंगों से रंगी उनकी रचनाएं केवल कल्पना पटल पर नहीं यथार्थ का चित्रण भी थीं.
ज़िंदगी की उदासियों में
चुटकी भर रंग घोले 
अश्क में मुहब्बत मिला कर
थोड़ा-सा रुमानी हो लेंं
-श्वेता
अब चलिए आज के.हमक़दम की रचनाओं की ओर
अब रुमानी शब्द का सही मतलब समझिए
हमारे पाठक रचनाकारों के द्वारा सृजित बहुमूल्य, सारगर्भित,
सृजनशील लेखनी द्वारा निःसरित
सार्थक अभिव्यक्ति से।
आइये आप भी साहित्य सरिता में गोते लगाइये-
मीना भारद्वाज

झील का किनारा और ऊँचे पहाड़ 
हरी-भरी वादी में वक्त बितायें । 
मन ने ठानी है आज 
हम भी रूमानी हो जाएँ ।।
★★★★★
आदरणीय पुरुषोत्तम जी

हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता,
ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा,
कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा.......
हमेशा की तरह, फिर दिखते कुछ ख्वाब सुनहरे,
कुछ बनते बिगरते, कुछ टूट के बिखरे,
सपने हों ये जैसे, किसी हकीकत से परे......
आदरणीया साधना वैद जी की दो रचनाएँ

पन्नों के बीच
सूखी सी पाँखुरियाँ
गीली सी यादें

 तुम्हारी बातें
जब आती हैं याद
जगातींं रातें 

भीगी सड़क
रिमझिम फुहार
हाथों में हाथ
★★★
साधना वैद 

ज़िंदगी के तिक्त सागर में समा ,
प्रेम की सरिता भी खारी हो गयी ,
खो गयी रूमानियत जाने कहाँ ,
कह सके ना चाह कर तुमसे कभी ! 
★★★★★
कुसुम कोठारी

फूल दिया किये उनको खिजाओं में भी
पत्थर दिल निकले फूल ले कर भी ।

रुमानियत की बातें न कर ए जमाने
अज़ाब ए गिर्दाब में गुमगश्ता है जिंदगी भी।
★★★★★★
आदरणीया अनिता जी

क़दमों  में  घुँघरू , थिरक रहा तन, 
 तरु  संग  इठलाये, झूम रहा  मन, 
 आँखों में झलके  प्रेम  की लगन, 
 बावरी   पवन का मिज़ाज   रूमानी.........
★★★★★
अभिलाषा चौहान

जीवन की अंतिम सांझ है ये
दीपक भी अब बुझने को है
जरा देना तुम अपना हाथ जरा
महसूस करूं गर्माहट जरा।

तुम मेरे कांधे पर सर रख दो
मैं तुमको फिर महसूस करूं
अब थोड़ा सा रूमानी होते हैं
बस प्रेम का जीवन जीते हैं।
★★★★★★
आशा सक्सेना

यूँ तो हैं
साधारण नयन नक्श
पर दिल है बहुत रूमानी
यह  बात कम ही जानते हैं
जो जान जाते हैं
★★★★★
सुप्रिया रानू
खिल गए पीले टहटहाते फूल 
हरी पतियों के बूटों पर,सरसो के,

मूंगफलियों के दानों 

की मिठास अब भी वही है 

जैसे रस घुला हो बरसो के,

कोहरो ने जबसे घर बना डाला

है जमीन के आंगन में 
जैसे आलम धरा का सारा आसमानी हो गया
तुम्हारी आहटों से ही देखो 
कैसे मंजर रूमानी हो गया...
★★★★★
 आदरणीया रेणु जी की लेखनी से
रूमानियत का  है करिश्मा आपकी ,
  मुझसे ही मुझको  मिलाया आपने !


हुआ एक पल भी दूभर बिन आपके ,

   खुद का यूँ आदी बनाया आपने !
★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीय शशि जी की लेखनी का 
अलग अंदाज़
रुमानी महफ़िल में नफ़रतों के ये सौदागर!

रूमानी महफ़िल की क्या बात करूँ
नफरत के सौदागर संगीन लिये खड़े हैं
जो अपने घरों को देवालय बना न सकें
वे जुबां पर खुदा का पैगाम लिये खड़े हैं
 बोलों हम क्यों  राम-रहीम के इस वतन में
 फिर सियासत का यह जाम लिये खड़े हैं
 इस जग में पल भर तो मुस्कुरा लेने दो
 ये मरघट भी कफन तैयार लिये खड़े हैं ..

★★★


सुनिये मेरी पसंद का एक गीत

  ★
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कैसा लगा
कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया
प्रेषित करें।
आप सभी के अतुलनीय सहयोग
के लिए
सादर आभार ।



दर्द को तवज्ज़ो कितना दें
दामन रो-रो कर भीगो लें
चुभते लम्हों को दफ़न करके
बनावटी चेहरों पे कफ़न धरके
वफ़ा की बाहों में सुकूं से सो लें
थोड़ा-सा रुमानी हो लें 








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