भारतीय संगीत की सबसे बड़ी खूबी यह है की इसका हर सुर, राग और हर पल, घड़ी,
दिन और मौसम के हिसाब से रचे गए हैं। किस समय किस राग को गाया जाना चाहिए,
इसकी जानकारी संगीतज्ञों को होती है।
दिन और मौसम के हिसाब से रचे गए हैं। किस समय किस राग को गाया जाना चाहिए,
इसकी जानकारी संगीतज्ञों को होती है।
आत्मा,प्रकृति और संगीत का प्रगाढ़ संबंध हैं। या यों कहें कि प्रकृति ही संगीत है। प्रकृति के कण-कण में
समाया राग जीवन में विविध भाव उत्पन्न करता है। प्रकृति का अनूठा वरदान वर्षा ऋतु का आनंद
अवर्णनीय है। छनकती बूँदें तन-मन में स्फुरण जगाकर उल्लास और उमंग से भर देती है। तपती धरती
और गरम थपेड़ोंं से व्याकुल तन-मन पर ठंडी फुहारों की रागिनी का आनंद शब्दों से परे है।
समाया राग जीवन में विविध भाव उत्पन्न करता है। प्रकृति का अनूठा वरदान वर्षा ऋतु का आनंद
अवर्णनीय है। छनकती बूँदें तन-मन में स्फुरण जगाकर उल्लास और उमंग से भर देती है। तपती धरती
और गरम थपेड़ोंं से व्याकुल तन-मन पर ठंडी फुहारों की रागिनी का आनंद शब्दों से परे है।
कारे-कजरारे बादलों और तरंगित बूँदों की रागिनी से उत्पन्न संगीत मेघ-मल्हार है। ऐसा माना जाता है
मेघ-मल्हार मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। इस राग से मेघाच्छन्न आकाश, बूँदों का नर्तन,दामिनी
गर्जन जैसी सुखद अनुभूति होती है। रिमझिम फुहारों में भींगने को आमंत्रित करती वर्षा ऋतु के रस और
गंध में डूबी संगीत-संरचना मेघ-मल्हार है। राग की बात हो और तानसेन को भूल जाये ये संभव कैसे हो?
मेघ-मल्हार मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। इस राग से मेघाच्छन्न आकाश, बूँदों का नर्तन,दामिनी
गर्जन जैसी सुखद अनुभूति होती है। रिमझिम फुहारों में भींगने को आमंत्रित करती वर्षा ऋतु के रस और
गंध में डूबी संगीत-संरचना मेघ-मल्हार है। राग की बात हो और तानसेन को भूल जाये ये संभव कैसे हो?
संगीत के गगन को असंख्य राग-रागनियों से सजाने वाले तानसेन के संबंध में अनेक लोकोक्तियाँ
प्रचलित है। जैसे दीपक राग गाने से गर्मी उत्पन्न होना और राग मेघ-मल्हार से मेघों का घुमड़कर
बारिश हो जाना।सच चाहे जो भी हो किंतु यह सत्य है कि मेघ मल्हार जीवन का वह संगीत है
जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
प्रचलित है। जैसे दीपक राग गाने से गर्मी उत्पन्न होना और राग मेघ-मल्हार से मेघों का घुमड़कर
बारिश हो जाना।सच चाहे जो भी हो किंतु यह सत्य है कि मेघ मल्हार जीवन का वह संगीत है
जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
आज के विषय मेघ-मल्हार पर हमारे रचनाकारोंं की क़लम ने शब्दों की बूँदें बरसाकर सोंधी खुशबू बिखेर दी है और बूँदों की रागिनी से झंकृत हृदय सुंदर रचनाओं का रसपान कर रहा है।
आइये आपकी रचनाओं के संसार में चलते हैं-
आप के द्वारा सृजित हमक़दम का यह अंक
आपको कैसा लगा कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के
द्वारा अवश्य अवगत करवाइयेगा।
हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक देखना न भूले।
अगले सोमवार फिर मिलेंगे नये विषय पर
आपके द्वारा सृजित रचनाओं के साथ।
आज के लिए बस इतना ही
-श्वेता सिन्हा
चहुँ ओर पावस भर लाए
मोर -पपीहा झूमे -नाचे
कोयल छेड़े राग मल्हार
धरती भी तो झूम रही है
पहन चुनरिया धानी
पत्ती -पत्ती सजी हुई है
◆●◆
कण - कण से फूट रहे,
आनंद अंकुर,
झरनों ने छेड़ दिए
मधुर राग - सुर !
प्यासी पृथ्वी भीगे
अमृत बौछार ।
मन मगन मदमस्त गाए,
मेघ मल्हार ।।
●◆●
आदरणीया साधना वैद जी की क़लम से
कहाँ हो तुम ?
क्या तुमने भी कलयुग में आकर
अपनी प्रथाएँ और
परम्परायें बदल ली हैं ?
क्योंकि
नहीं करते ये मेघ अब
विश्वसनीय दूत का काम,
नहीं लाकर देते ये सन्देश
◆●◆
कवितायेँ भी... पीछा ही नहीं छोड़ती,
धमक पड़ती हैं कभी भी
मानती ही नहीं बिना लिखवाये,
कागज़ की नावों पर सैर कराती
मेघ की मल्हार पर कथक करवाती हैं,
तबले की थाप और बाँसुरी की धुन बनी,
पोर-पोर सरगम सी घुल घुल जाती हैं,
◆●◆
किसकी छवि पे मुग्ध मयूरा
सुध बुध खो नर्तन करता ?
कोकिल सु -स्वर दिग्दिगंत में
आनंद कैसे भर पाता ?
टप-टप गिरती बूंदों बिन -
कैसे आंगन में उत्सव सजता ?
दमक दामिनी संग व्याकुल हो
जो मेघ-राग मल्हार ना गाता ?
◆●◆
मेघ मल्हार ऋतु आई बसन्ती
पावस नार हुई रसवन्ती
बूँद बूँद पायल सी छनके
चले नार कोई रसवन्ती !
मेघ मल्हार ऋतु .......
भर भराय बदरा झरी आये
★
◆●◆
पावस ऋतु पिय घर को आये
भरे नयन पर लब मुस्काये
मेघ मल्हार सी भई विरहणी
जल तरंग तन लरजत जाये !
चटख चटख नव वृंद खिल्रे है
★
छलक रहे मधु रस के प्याले
कली कली भँवरे रस पीते
मदमाते मति भ्रम में फिरते !
बिजुरिया चमकत ज्यों नभ गरजत
कुँज कुँज में बोले कोयलिया
कजरारे नैन पिय तरसत
पिय आवन की देय खबरिया !
◆●◆
आदरणीया अभिलाषा चौहान जी की रचना
विहग अवली झूमती जाती गगन में
बन गलहार मेघ का सत्कार करने
पवन मुक्त छंद स्वागत गान करते
वृक्ष भी लय ताल संग नृत्य करते
◆●◆
घनर घनर घनघोर घटा, गाये मेघ मल्हार
चमक चमक चमके बिजुरी, तेज कटार।
कारे कारे बदरा छाए,झूम के पपीहा गाये
छमक छमक छमछम नाचे बरखा बहार।
चांदी से चमकती आँगन नाचती बर्षा बूंदे
●◆●
घुमड़ता मेघ, मल्हार गा रहा
मदमाती बूंदों का श्रृंगार गा रहा
सरसती धरा का प्यार गा रहा
खिलते फूलों का अनुराग गा
कलियों का सोलह सिंगार गा रहा
★
मन की झांझर ऐसी झनकी
रुनझुन रुनझुन बोल रही है
छेडी सरगम मधुर रागिनी
मन के भेद भी खोल रही है।
आज सखी मन खनक खनक जाय।
प्रीत गगरिया छलक रही है
ज्यो अमृत उड़ेल रही है
मन को घट रीतो प्यासो है
बूंद - बूंद रस घोल रही है
आज सखी मन खनक खनक जाय ।
◆●◆
छाई घन घोर घटाएं
वारिध भर लाए जल के घट
उनसे बोझिल वे आपस में टकराते
गरज गरज जल बरसाते
दामिनी दमकती
हो सम्मिलित खुशी में
नभ में आतिशबाजी होती
झिमिर झिमिर बूँदें झरतीं |
विरही मन
देख काली घटाएं
हुआ बेकल
अश्रुओं की वर्षा करता
जल प्लावन का
सन्देश दे रहा
मेघ आषाढ़ का
◆●◆
जेठ से तपन से सूखी प्रकृति,
समंदर भी अब खौल रहा,
नदियों का जल सुख चला है,
धरती का आनन जल रहा,
बरसाने को अम्बर से रस फुहार रे,
आओ गाएँ मेघ मल्हार रे...
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-श्वेता सिन्हा














