होंगी तुम्हारे पास ज़माने भर की डिग्रियां पर,
किसी की छलकती आँखों को न पढ़ सको तो हो तुम
अनपढ़-गवार
घर में माँ-बेटा दो ही तो जीव थे।
बेटा भी ऐसा कि कलियुग में लोगों को श्रवण की कथा
याद आ जाए पर यह आज उसको क्या हुआ?

हमें अनुभवानुभूति होने के बाद ही पता चलता है
विश्वास और विश्वासघात के बीच बस बारीक रेखा ही तो है
कब इस पार से उस पार हो जाये परिणाम का पता बाद में ही चलता है
स्कूल की यादें खट्टी मीठी
याद हमे रह जाएगी,
यहाँ पड़ा जो किताबो में,
वो मंजिलो को पहुचायेगी,
अनपढ़
कोशिशों के बाबजूद हो जाती है कभी हार,
होके निराश मत बैठना मन को अपने मार,
बढ़ते रहना आगे सदा हो जैसा भी मौसम,
पा लेती है मंजिल चिटया भी गिर-2 कर हर बार,

अनपढ़!
यूनिवर्सिटी के जाने माने प्रोफेसर बैठा दो अगर उसके पसीने ना छूट जाए तो कहना
अनपढ़ होते हुए भी उर्दू, हिंदी, इंग्लिश, फ्रांसीसी, लेटिन (letin), यूनानी (greek) आदि भाषाओं चलती फिरती डिक्शनरी है कासिम सैफ़ी
सहारनपुर के एक गरीब परिवार मे जन्मे कासिम सैफी के दादा इलाही काम घड़ी साज का था इसलिए वे भी घड़ी की मरम्मत करने का कार्य करते थे
अनपढ़
जाँ बात-बात में हात मानीं
वै हैतीं कूनी ग्राम सभा…
जाँ सब कूनी और क्वे न सुणन
वै हैतीं कूनी लोक सभा!

ना अनपढ़ रहे , ना काबिल हुए
खामखाँ ए जिंदगी , तेरे स्कूल में दाखिल हुए...!
अनपढ़ से लगते हो
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छब्बीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
'मेघ-मल्हार'
...उदाहरण...
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार, अली री !
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार
चमक-चम-चम बिजुरीया चमके,
छमक-छम-छम पानी की बौछार, अली री
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार
कल-कल-कल-कल,संगीत नदी का,
सर-सर-सर-सर , करे आम की डार, अली री
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार
उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है
आप अपनी रचना आज शनिवार 07 जुलाई 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 09 जुलाई 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
