हजार के आगे का दसवां कदम....
सादर अभिवादन
दुर्घटना...
कहीं भी..कभी भी
कहीं भी..कभी भी
हो सकती है....
भले ही हम पूरी सावधानी बरत रहें हैं
भले ही हम पूरी सावधानी बरत रहें हैं
अब ये कहा जाए कि
सामने आगे वाले से सावधान रहें....और
पीछे वाले को जाने की जगह दें
पीछे वाले को जाने की जगह दें
...चलिए आज-कल पढ़ी रचनाओं पर एक नज़र

क़दमों की आहट...श्वेता सिन्हा
पागल समुंदर की लहरें
चाँद की उंगलियां छूने को बेताब
साहिल पर सीपियाँ बुहारती चाँदनी संग
रेत पर खोये क़दमों के निशां चुनती है।

क़दमों की आहट...श्वेता सिन्हा
पागल समुंदर की लहरें
चाँद की उंगलियां छूने को बेताब
साहिल पर सीपियाँ बुहारती चाँदनी संग
रेत पर खोये क़दमों के निशां चुनती है।

हर तरफ झूट के किस्से
अश्क आधे रूह आधी सी !
कोई कैसे जिये मुकम्मल सा
बात आधी सी रात आधी सी !
हारना तुम्हें आता नहीं
हराना मैं चाहता नहीं
ऐसी बाज़ी खेलने से क्या मतलब?

कुछ दिन से मन उदास
और अभिव्यक्ति खामोश है
समाज में असुरक्षा की सुनामी ने
सोचों का दायरा संकुचित और
जीवन पद्धति का प्रतिबिम्ब
धुंधला कर दिया है

यूँ ही नहीं चर्चा होती है मेरी,हर महफ़िल में
प्रेम की अविरल धारा, बहती है मेरे दिल में।
नफरतों का बाज़ार,भले ही गर्म कर लो तुम
प्रेम की सुधा बरसती है हरपल मेरे दिल में।
अपनी तपन से तपा
अपनी गति से थका
लेने विश्राम ,शीतलता
देखो भास्कर उतरा
सिन्धु प्रांगन मे
करने आलोल किलोल ,

एक पूरा युग
अपने भीतर जी रही है स्त्री,
कहती है ख़ुद को नासमझ,
उगाह नहीं पायी अब तक
अपनी अस्मिता का मूल्य,
आज क्यूँ है खड़ी, ये उदासी बड़ी
सुलगे क्यूँ हैंअरमान, बेबसी है कड़ी
ज़िन्दगी दुल्हन बनी, बेजारी की घडी


