नमस्कार ! यूँ तो मैंने सोचा था कि ब्लॉग्स की मैराथन रेस के बजाये मैं केवल १०० मीटर की रेस ले कर आऊँगी , बल्कि ५० मीटर की भी होती हो तो उतनी ही ....... लेकिन जब ब्लॉग्स पढने बैठती हूँ तो कोई छोड़ा नहीं जाता .....आज कल पाठक कम और लेखक ज्यादा हो रहे हैं .......एक गुज़ारिश है कि हम सभी चर्चाकर अपना समय दे कर ब्लॉग्स पढ़ कर लिंक्स लगाते हैं ,तो कृपया पाँच लिंकों के आनंद पर जो लिंक्स दिए जाते हैं उन तक अवश्य पहुँचें ......... वैसे भी एक बात जो मुझे अनुभव हुई है कि जिनके ब्लॉग्स की पोस्ट होती है वही बस यहाँ आते हैं और धन्यवाद ज्ञापन कर हौसला बढाने का प्रयास करते हैं .......जबकि इस मंच की उपयोगिता है कि ब्लॉगर साथी नयी पोस्ट तक यहाँ से आसानी से पहुँच कर ब्लॉगर्स की पोस्ट पढ़ कर उनका हौसला बढ़ाएं ........ खैर .... ये तो आप लोगों पर छोड़ती हूँ कि इस मंच को उपयोगी समझें या महज़ खानापूर्ति ......... हम लोग तो निष्ठा से अपना काम करते रहेंगे ...................
मेरे मन की बात बहुत हुई ...... अब हमारी एक प्रतिष्ठित ब्लॉगर के मन में कुछ प्रश्न हैं ........ वो चाहती हैं कि उस पर कुछ विचार विनिमय हो .... तो अपने पाठकों से निवेदन है कि वहाँ जा कर अपने विचार खुल कर लिखें ..... उन्होंने सबसे पूछा है ...
एक सवाल -
गोकुल की वह सुबह,
सावन लिखा
तो
मायका याद आया,
इस घर से वहाँ जाना,
नीम पर पड़ा झूला,
सारी सहेलियों की टोली,
और कभी कभी रिश्तों में बर्फ तो कभी लावा भी महसूस होता है ......
लावा
एक सन्नाटा
एक ख़ामोशी
किस कदर
एक दूजे के साथ है
"सन्नाटा" जमे हुए लावे का
"ख़ामोशी "सर्द जमी हुई बर्फ की
और सबसे मजेदार बात ये कि जहाँ एक दूसरे से परिचित नहीं , कुछ जानते नहीं .... बस बाँधे गए बंधन में तब क्या क्या महसूस होता है ....... पढ़िए एक बेहतरीन रचना .....
न प्यार था न परिचय
बस दो अजनबी…
न वो सूरज था न वो किरन
न वो दिया था न वो बाती।
न वो चाँद था और न वो चाँदनी
एकदम विपरीत थे वे दोनों…
अब बताईये भला इतना छोटा भी कोई शीर्षक रखता है ........ ऐसा लग रहा कि गलती से लिख दिया ----- वे .......... खैर ....... इससे निकल कर आ जाते हैं आज के माहौल में , जहाँ लड़कियाँ पढना तो चाहती हैं लेकिन उनके पिता क्या अवधारणा रखे हुए हैं ....
ख़ामोश सिसकियाँ
”कैसे नहीं लगती दोनों जगह वाली दो-दो खेजड़ी की हैं, पूछो सुनीता, सुमन और सजना से, हम चारों ने मिलकर इकट्ठा की हैं।”
रघुवीर चोसँगी ज़मीन में गाड़ते हुए पसीना पोंछता है।
आज भी गाँव में ऐसी स्थिति देखने को मिलती है ... भई ही भाई का गला भी काट रहा ..... कहाँ कद्र है रिश्तों की ? और इन्हीं बातों से विचलित मन क्या क्या सोचने पर मजबूर कर देता है .....
श्वास अंतिम दौर में
भूलता अस्तित्व अपना
खो रहा इस ठौर में
राह से भटका हुआ हूँ
बन गया कुछ और मैं।
भटकते -भटकते भी इंसान का इंसान से ऐतबार नहीं जाता ...... भले ही हर बार धोखा मिलता रहे ...... लीजिये पेश है एक खूबसूरत ग़ज़ल ----
समा गयी रूहें ,बिछोह कैसा अब
हिज्र टले न टले , क़रार तो है ....
फुर्सतें कब उलझनों में दुनिया की
वक़्त मिले न मिले,इख़्तियार तो है....
यूँ हमें फुर्सत मिले न मिले ....... लेकिन प्रकृति जो छटा चारों ओर बिखेरे हुए है , उसके लिए तो अपने आप ही वक़्त निकल आता है ....... एक खूबसूरत रचना .....
प्रकृति की बात तो हो गयी , लेकिन आपने ये भी पढ़ा होगा कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है ....... तो आज जानिए जिसे आप में से हर कोई प्रयोग करता है कब अचानक इसकी ज़रूरत पड़ जाती है ...... इसका आविष्कार क्यों और कैसे हुआ ......
सेफ्टी पिन एक ऐसी वस्तु है जिसे छोटा-मोटा ऑलराउंडर कहा जा सकता है। कपड़ों को सम्हालने के अलावा ये कभी बटन का काम करता है तो कभी औजार का। आम घरेलू जीवन में तो इससे इतने तरह के काम लिये जाते हैं, जिनके बारे में लिखते-लिखते लंबी सूची बन जाएगी।
आज बस इसके साथ ही हलचल को विराम देती हूँ ......... इस रिले रेस में साथ साथ दौड़ लीजियेगा .....
धन्यवाद के साथ नमस्कार .....
संगीता स्वरुप .