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सोमवार, 21 सितंबर 2015

पर्युषण का पर्व है ,रोज भजो नवकार.... अंक पैंसठ

आसमां टुकड़ो में न बाटों उजाले के लिए,
डूब न जाए कहीं सूरज कई सालों के लिए.
- दुष्यंत कुमार

सादर आभिवादन....

सीधे चलते हैं रचनाओं का ओर.....



हर अदा तेरी
अधिक समीप लाती
तू ही तू नज़र आती
स्वप्नों में सताती |
जुम्बिश अलकों की


गंध-मुग्ध मृगी एक निज में बौराई, 
विकल प्राण-मन अधीर भूली भरमाई . 
कैसी उदंड गंध मंद नहीं होती, 
जगती जो प्यास ,पल भर न चैन लेती . 


प्याज में मात्र
भोजन की सीरत सूरत स्वाद सुगंध
बदलने की कूबत ही नहीं
सत्ता परिवर्तन की भी क्षमता है.
प्याज और सरकार
एक दूसरे के पर्याय हैं.


नाम चरणामृत का लेकर
विष  पिला डाला किसी नें 
जब सुमिरनी  हाथ में ली
तोड़  दी  माला  किसी नें 


पर्यूषण दोहे 
पर्यूषण का पर्व है ,रोज भजो नवकार |
अंतरमन को शुद्ध कर ,होंगे दूर विकार ||

महामंत्र नवकार है ,सुनना सुबह शाम |
सबसे अच्छे पर्व का, पर्यूषण है नाम ||


दो दिनों से तबियत में कुछ नरमी सी है
फिर भी ठीक हूँ...



अपनी आगाज से आज तक..
'जिंदगी' तेरे हीं याद में गुम रही ...
फिर भी जाने क्यूँ ये एहसास है ,
जैसे चाहत मेरी कम रही .....!!

--सोनू अग्रवाल--
आज्ञा दें यशोदा को...
फिर मिलते हैं न...












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