प्रिय यशोदा दीदी जी सादर नमस्कार।
मंच पर सम्मान देने हेतु हार्दिक आभार।
समय अभाव के चलते पाँच रचनाओं के साथ उपस्थिति दर्ज हो।
स्नेहाशीष यों ही बना रहे।
अनीता सैनी
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गूँगी गुड़िया : धोरों का सूखता पानी
उस दिन
उसके घर का दीपक नहीं
सूरज का एक कोर टूटा था
जो ढिबरी वर्षों से
आले में संभालकर रखी है तुमने
वह उसी का टुकड़ा है।
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देखो तो!
कविताएँ सलामत हैं?
मरुस्थल मौन है मुद्दोंतों से
अनमनी आँधी
ताकती है दिशाएँ।
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गूँगी गुड़िया : तुम्हारे पैरों के निशान
उसने कहा-
सिंधु की बहती धारा
बहुत दिनों से बर्फ़ में तब्दील हो गई है
उसके ठहर जाने से
विस्मय नहीं
सर्दियों में हर बार
में तब्दील हो जम जाती है
न जाने क्यों?
इस बार इसे देख! ज़िंदा होने का
भ्रम मिट गया है
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कई-कई बार, कि हर बार
तू बह जाने से रह गई?
कुछ तो बोल! क्रम भावों का टूटा
आरोह-अवरोह बिगड़ा भाषा का
कि कविता सांसें सह गई?
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प्रेम फ़िक्र बहुत करता है
लगता है जैसे-
ख़ुद को समझाता रहता है
कहता है-
"डिसीजन अकेले लेना सीखो
राय माँगना बंद करो
तुम मुझसे बेहतर करती हो।"
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