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मंगलवार, 24 मार्च 2026

4691... आरंभ हुआ नवीन अध्याय

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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मानवता की सीख बचपन से ही
कंठस्थ करवाया जाता है
जब घर के बड़े समझाते हैं
"सबसे प्यार करो"
"पशुओं पर दया करो"
"भूखे को खाना खिलाओ"
"प्यासे को पानी पिलाओ"
"किसी को अपने फायदे के लिए मत सताओ"
और भी न जाने कितनी अनगिनत बातें होगी
जो हम सभी समझते और जानते हैं।
फिर भी समाज में अमानवीयता और बर्बरता 
की बहुलता,असंतुलन
क्या हमारी जड़ोंं के
खोखलेपन का संकेत है?
या फिर,
मानवता और दानवता के 
दो पाटों में पीसते मनुष्य मन
की कहानी
सृष्टि के विधान के अनुसार? 
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आज की रचनाऍं- 

 
आरंभ हुआ नवीन अध्याय
संघर्ष और विजय का पर्व
समय की समता का उत्सव
नव चेतना का शुभ पदार्पण 


मगर इश्क़—
मंज़िल नहीं पूछता,
वो बस चलाता है…

कभी किसी के साथ,
कभी बिल्कुल अकेले—
पर हर मोड़ पर
तुम्हें तुमसे मिलाता है।




खुशियों की दौलत बटोरी उन्होंने
गमों की सौगात मिरे नाम आई
 
ख़ुशी का है आलम, तुम संग में हो
बड़ी मुश्किलों से है ये शाम आई





एयरपोर्ट पर भी और फिर पूरे सफर में सभी लोग अपने अपने फोनों में घुसे मानो फोन नहीं देश चला रहे हों – सब एकदम धीर गंभीर। कान में इयरफोन और उँगलियाँ फोन की स्क्रीन पर घूमती। पति पत्नी भी आपस में बात करने की बजाय अपने अपने फोन में मशगूल दिखे। अच्छा लगा कि इसी बहाने उनका सफर बिना झगड़े और बहस के कट गया।




ऐसी तुकबन्दियाँ और भी हैं पर अभी मुझे इतनी ही याद हैं ।
कपड़ा, जेवर, शान-शौक और सुविधाओं से वंचित, जीवन की गाड़ी को मरुस्थल में भी हँस कर खींचने वाली ये ग्रामीणाएं जिस सहिष्णुता से जीवन की विसंगतियों से जूझती हैं ,सम्बन्धों का उत्सव भी उतने ही उल्लास से मनातीं है । स्नेह का ऐसा उदार और गहरा रूप अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । हालाँकि उनके स्नेह व उदारता की कभी कोई कहानी नही बनती ।
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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