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गुरुवार, 24 नवंबर 2022

3587...हर कोई देखना चाहे है, ख़ुद का चेहरा बेदाग़

शीर्षक पंक्ति:आदरणीय शांतनु सान्याल जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

ओ नारी, 

ओ नारी अब जाग जाउठ खड़ी हो ! कब तक भरमाई रहेगीमिथ्यादर्शों का लबादा ओढ़कब तक दुबकी रहेगीपरंपरा की खाई में 

मन पूछता है.....

नारी हो तुम शक्ति पुंज कहलाती हो.......

अताताइयों को क्यों सिरमौर  बनाती हो....

प्रेम की भाषा जो समझ सका न कभी....

उसके ऊपर क्यों व्यर्थ समय गवांती हो

मां की देहरी लांघना थी प्रथम भूल तुम्हारी

प्यार आह में बदला,क्यों नही आवाज उठाई थी

नारी दुर्गा काली है, क्या खूब निभाया तुमने....

पैतीस टुकड़ों में कट कर उस दानव के हाथ

जान गवाई.....

 बहुत कुछ बाक़ी है--

हर कोई देखना चाहे है, ख़ुद का चेहरा बेदाग़,
ज़ेर ए नक़ाब आइने का राज़े इज़हार बाक़ी है,

उस भली सी इक ललक को

नहीं माँगे सदा देती

नेमतें अपनी लुटाती,

चेत कर इतना तो हो कि

फ़टे दामन ही सिला लें!

ये कहाँ जा रहें हम??

हमारे यहां धन से ज्यादा सद्गुणों को महत्व दिया जाता था।आज धन सर्वोपरि है। पूंजीवादी व्यवस्था ने संस्कारों की चिता जला दी है।रिश्ते-नातों का कोई महत्व नहीं रहा।पति-पत्नी के रिश्तों में बढ़ती खटास,एकल परिवार आज बच्चों में आक्रोश के जनक बन गए हैं।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

7 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    सुंदर चयन
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. आभार आपका रविंद्र जी हमारी रचना को शामिल करने के लिए।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात! सराहनीय रचनाओं का सुंदर संकलन, आभार!

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  5. मुझे शामिल करने हेतु असंख्य आभार आदरणीया, सभी रचनाएँ असाधारण, नमन सह ।

    जवाब देंहटाएं

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