निवेदन।


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शनिवार, 1 अगस्त 2026

4821 ..गगन झुका धरती को छूने, छाई मधुर उमंगिया।

सादर अभिवादन 
स्वागत है अगस्त 


बड़ी बात कह डालने का अवसर आ गया
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

विषय था "कल्पना" 
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 
रचना भेजने की अंतिम तिथि 30 जुलाई 2026 थी
इस प्रथम अंक को लेकर आएंगी श्वेता जी
अगले अंक का विषय भी दो तारीख को ही बताएंगे
प्रथम अंक पाक्षिक का अवलोकन करें दो अगस्त को


मेरी पसंदीदा रचनाएं




हम सभी ने महसूस किया है कि जब भी ये दोनों कहीं भी, कभी भी प्रसारित होते हैं तो तन-बदन में एक ऊर्जा सी भर जाती है ! दिल-ओ-दिमाग गौरवान्वित हो उठते हैं ! तन-बदन में एक लोमहर्षक रोमांच का अनुभव होने लगता है ! ना जाने क्या जादू छिपा है इनके शब्दों में कि पूरे शरीर में  देशभक्ति की लहर सी दौड़ जाती है ! हर देशवासी का फर्ज है, कर्तव्य है कि उसे तो ये दोनों रचनाएं कंठस्त हों ही, यह भी सुनिश्चित हो कि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे पूर्णतया परिचित हों ! 
जय हिन्द ! वंदे मातरम !!





प्रतिकार के इस स्वर को
एक दिन
गालियों से परे
अपना मुहावरा गढ़ना होगा।

तंग गलियों से निकलकर
पहचान बनानी होगी।





हर डाली पर मुस्कुराती बहार,
मन को देती प्रेम का उपहार।
मंद पवन जब इन्हें सहलाती,
हर कली मधुर गीत सुनाती।




अब सीमा सीने का दर्द भूलकर काल्पनिक अपमान के दर्द को महसूस करने लगी। “नहीं भगवान! प्लीज आज मत मारना। आज ना तो मैं प्रिपेयर हूँ और ना ही मेरा घर।” यही प्रार्थना करते-करते सीमा गहरी नींद में सो गई







बड़ी उदास थी जो रे धरती, ओढ़ी हरी चुनरिया,
गगन झुका धरती को छूने, छाई मधुर उमंगिया।
बादल ने जब ढोल बजाया, बिजली चम-चम चमकी,
पूरब की इस ठंडी हवा में, हर एक कलियाँ महकी!


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

4820...मील का पत्थर हूॅं मैं...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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आज कालजयी साहित्यकार की
जयंती है।
प्रेमचंद ने कहा था-

बनी हुई बात को निभाना मुश्किल नहीं है 
बिगड़ी हुई बात को बनाना मुश्किल है।
( रंगभूमि)

क्रिया के पश्चात प्रतिक्रिया नैसर्गिक नियम है।
(मानसरोवर-सवा सेर गेहूँ)


टप-टपाती मादक बूँदों की
रुनझुनी खनक,
मेंहदी की 
खुशबू से भींगा दिन,
पीपल की बाहों में
झूमते हिंडोले,
पेड़ों के पत्तों,
छत के किनारी से
टूटती
मोतियों की पारदर्शी लड़ियाँ
आसमान के
माथे पर बिखरी
शिव की घनघोर जटाओं से
निसृत
गंगा-सी पवित्र
दूधिया धाराएँ
उतरती हैं
नभ से धरा पर,
हरकर सारा विष ताप का
 अमृत बरसाकर
प्रकृति के पोर-पोर में
भरती है
प्राणदायिनी रस
सावन में...।
#श्वेता


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आज की रचनाऍं-

फुर्सत मिले कभी,
दर्पण में
अपनी आँखों को
ज़रा देर तक निहारना।

शायद तब
तुम्हें भी मालूम पड़े
कि वे
कितना कुछ कह जाती हैं—
बिना एक भी शब्द बोले।



 मेरे पंखों पर क्यूं 
उतर आता है तुम्हारा वज़न।
आईना बन जाते हो क्यों?
मुझे सुंदर तो कभी, उदास दिखने को।
मील का पत्थर हूं मैं
पर तुम चाहो जब मुझे
पत्थर तो कभी, झरना बना देते हो।
पृथ्वी हूं, घूमती हूं धुरी पर अपनी।
पर तुम सूर्य बन कर।
कभी रात तो कभी, दिन दिखा देते हो।



सृजन के लिये 
कई बार निर्माण भी होता है
जब गढी जाती है नई मूर्ति 
विध्वंस के बाद

अन्तर प्लावन

कुछ बह जाता है क्षण में हम
देखते रह जाते हैं अवाक,
उन निःशब्द पलों में
जीवन पा जाता
है आत्म सुख
अपरम्पार,
इस
असीम डूब में निहित है सारा संसार,

मन

अगर अपनी क्षमताओं पर अपनी कल्पना पर विश्वास नहीं करेंगे तो अवचेतन में नकारात्मक तत्व जुड़ने लगेंगे जो आपके पंखों को अवश कर देंगे । वे फड़फड़ायेंगे पर उन पंखों को लगेगा कि नहीं ये नहीं उड़ेंगे और कहीं  बिखर जायेंगे। यदि विश्वास नहीं डगमगायेगा तो असफलता आपको नया मार्ग दिखायेगी।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 30 जुलाई 2026

4819 ..अल्बर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यो आता है

 सादर अभिवादन 


एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

शब्द विशेष है "कल्पना" 
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 
रचना भेजने की आज अंतिम तिथि 30 जुलाई 2026
हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म द्वारा
2 अगस्त 2026 को प्रथम अंक
पाक्षिक प्रकाशन


मेरी पसंदीदा रचनाएं

कम ही लिखते हैं आज कल
फेसबुक मे ही रमे रहते हैं
पर ग़ज़ब हो गया आज
दो रचनाएं लिख दिया 
शुभकामनाएं डॉक्टर जोशी कुमार सुशील जी को





किसी दिन 
जो कभी भूल जाऊँ मैं-
भूलते - भूलते 
अगर कभी तुम्हें भूल जाऊँ मैं उस समय को उस पल को दोष नहीं देना 
जब पहली बार मिले थे हम तुम! 
चाय के उन दो कपों में खौलती भाप में धुंधले हुए आँसू जाने खुशी के थे कि दुख के. 





कदम ख़ुद खुशी के लिए भी बढ़ा चुका हूँ बहुत बार,
मगर मेरे जाने का दर्द कोई ताउम्र ढो देगा।
बस इसी सोच में कदम खींच लेता हूँ पीछे,
मेरे बाद मेरे अपनों के लिए मेरे जैसा कोई नहीं हो देगा।





हमें कोई... 
इख़्तियार नहीं
वक्त की चाल पर 
फिर भी हर पल
दावा पेश करते हैं
वक्त के अपना होने का





अब कौन सा छछूंदर और ढूंढ के तुम ले आओगे
कितना गिरोगे हजूरे आला तुम अब लुढ़क जाओगे

रहने दो नापना एक फुट को तीस सेंटीमीटर से अब
अपनी उलझनों को जनता को खुद आ दिखाओगे




घर के राम कृष्ण हनुमान को साथ ले
सड़क कोई एक नापने निकल जाता है
अल्बर्ट पिन्टो गुस्सा भूल जाता है
लीला देख कर कल्कियों की भुनभुनाता है




सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 29 जुलाई 2026

4818...कभी मेरे संग चलते

 भोर वंदन 

"आज जो अच्छे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे अच्छे हैं। जो बुरे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे बुरे हैं। अच्छे लोग ज़्यादा हैं और बुरे कम हैं। अच्छे में सच्चे कम हैं और बुरे में सच्चे बहुत कम हैं। कुल मिलाकर सच्चे लोग बहुत कम हैं।"

विनोबा भावे

वर्तमान परिवेश पर नजर डाल कर उपर्युक्त पंक्तियॉ  पर नजर पडी,आप सब भी पढे और लिंकों को देखे..✍️

मौन की प्रतिध्वनि

 

कुछ शब्द

बिना बोले

निःशब्द कर देते हैं।

कुछ शब्द

बहुत बोलते हैं,

पर उन्हें

सुनता कोई नहीं।

वाक्यों के अर्थ..

✨️

चुप्पी

 चुप्पी के भी अर्थ बड़े हैं 

यूँ ही ताले नहीं जड़े हैं ।

संविधान को घोट रखा है 

लोकतंत्र की राह अड़े 

✨️

बिन छाँव की सड़क

बिन छाँव की सड़क

मैं सड़क हूँ,

कभी मेरे संग चलते थे पेड़ों के साये,

पंछियों के गीत,

और राहगीरों की मुस्कान।

आज धूप मेरे सीने पर

अंगार बनकर उतरती है।

✨️

मेरे भाव नदी का उमड़ता सोता

ऐ कविता शब्दों की तह में 

मेरे सारे दर्द छुपा लेना ,

जब अंतस् का भाव जगे

और हृदय आकुल हो जाये 

भींच अंक में सकल वेदना 

पंख पे कलम बिठा लेना 

ऐ कविता शब्दों की तह में 

मेरे सारे दर्द छुपा..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



मंगलवार, 28 जुलाई 2026

4817..... मुझसे बिछड़कर जाने वाला...

 मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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​मर्यादा के सारे तटबंध
तोड़ दिए इस शोर ने,
सभ्यता का सुंदर वस्त्र
चीर दिया इस दौर ने।
​गाली जब बनी 'कूल' होने का पैमाना,
तब भाषा ने धीरे से दम तोड़ दिया।
हमने अपनी ही संस्कृति का चेतना-पुंज,
अपने ही हाथों से फोड़ दिया।
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आज की रचनाऍं- 


थोड़ी देर स्वयं के संग भी, बैठ सकूँ तो बात बने,

मन के सूने आँगन में फिर, कोई चुप-सी भोर तने।

साँस-साँस जग को सौंप दी, अपने लिए जिया नहीं,

भीतर बैठा जो मैं था, उससे कभी मिला नहीं




गन्ध पुष्पों के 
बिना अब 
देवता पर क्या चढ़े?
शोक में 
डूबा हुआ मन 
मंत्र वैदिक क्या पढ़े?
तैर भी 
सकता नहीं 
गहरे भंवर के कूल हैं.


दिल की गहराई में 

जीवन का इक अंश छिपा है, 

श्रम के कटु प्रयत्न से मिलता 

स्नेहिल मृदु आँच में पका है ! 


दिल की गहराई में दीपक 

बिन बाती बिन तेल जल रहा,

श्वासों में अहर्निशा जैसे 

सहज मंत्र अनवरत चल रहा !



उसकी गली से रोज गुजरना 
शायद हो दीदार किसी दिन 

साक़ी का भी पूरा होगा 
सपनों का संसार किसी दिन 

मुझ से बिछड़कर जाने वाला 
लौटेगा इक बार किसी दिन 



एक दिन की बात है। वह जंगल में शिकार करने गया। काफी प्रयास के बाद भी उसके हाथ कोई शिकार नहीं लगा। वह काफी परेशान हो गया। अब वह थक भी गया था। तभी उसकी निगाह एक पेड़ पर पड़ी। उस पेड़ की डाल पर एक पक्षी बैठा था। उसने चुपके से जाकर पक्षी को पकड़ लिया। शिकारी पक्षी को लेकर जंगल के बाहर आया, तो उसने देखा कि एक हिरन सोया हुआ है





अभी जो कुछ पिछले दिनों दिल्ली में हुआ जहां बेकाबू-निरंकुश-पाशविक भीड़ ने दरिंदगी की हद पार कर दी, जहां महिला पुलिस कर्मियों तक को नहीं बक्शा गया ! जहां सुरक्षाकर्मियों की जान पर बन आई ! जहां धक्का-मुक्की, हाथा-पाई, गाली-गलौच, बेइज्जती की सारी सीमाएं लांघ दी गईं ! वहीं माहौल को संभालने में जिस धैर्य, जिस संयम, जिस परिपक्वता का उदाहरण दिल्ली की पुलिस ने दिया वह दुनिया में शायद ही कहीं देखने को मिले ! 


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 27 जुलाई 2026

4816 ...हर दौर में सलीब मिली अहल-ए-सच को ही,

 सादर अभिवादन 

रविवार, 26 जुलाई 2026

4815...हौंसले रख संभालकर पँछी...

 शीर्षक पंक्ति:आदरणीया डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

रविवारीय अंक में आपका स्वागत है। 

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

पढ़िए पाँच+ रचनाएँ-

190- बैठ ऐसे न हारकर पँछी!

पथ में सूरज कभी सताता है
खुद भी जलता , तुझे जलाता है
इसको ढलना , ढलेगा ही,इसका
आना-जाना यही बताता है -
हौंसले रख संभालकर पँछी
देख तू फिर उड़ान भर पँछी!

*****

ज़रा ठहरो!

​लेकिन सुनो,

यह आक्रोश जो तुम्हारी रगों में उबाल मार रहा है,

 कोई अभिशाप नहीं,

 तुम्हारी बची हुई जिजीविषा का प्रमाण है।

यह प्रमाण है कि तुम अभी मरे नहीं हो,

तुम व्यवस्था की खामोश बेड़ियों को

स्वीकारने से इंकार करते हो।

​पर इस आग को

केवल राख बन जाने के लिए मत जलने दो।

​*****

शिक्षा : सबसे बड़ा अस्त्र

जब विद्यार्थी
अपने अधिकार—शिक्षा—के लिए सड़कों पर उतरते हैं,
जब विद्यालयों के बंद होने की खबरें आती हैं,
और जब एक बेटी को शिक्षा के लिए
अपना जीवन गंवाना पड़ता है,
तो यह केवल एक परिवार का नहीं,
पूरे राष्ट्र का दर्द बन जाता है।
*****

छात्र आंदोलन जंतर मंतर

सेंक रहे सब गर्म तवे पर,दो रोटी।
उजले कपड़े नीयत रखते,जब खोटी।।
समाधान में चिकनी चमड़ी,रख मोटी।।
राजनीति की चौसर खेले,नित गोटी।।

*****

काई की पहली हरियाली

तलहटी में पड़े पत्थर
एक ही दिन में वहाँ नहीं पहुँचते।
उन्हें पानी
वर्षों तक
अपनी उँगलियों से
बीच धारा की ओर
सरकाता रहता है।

*****

बघेरा मर गया

कल अचानक एक चीख से सुनी जैसे किसी पिले को किसी ने मारा हो जैसे। बाहर देखा तो कुछ नहीं दिखा। 
आज सुबह पता चला कि बघेरा मार गया। मोंटू के आंगन में ही। एरिका वाणी बघेरा को देख रही थी हैरान परेशान। ये क्या हो गया। एरिका ज्यादा परेशान थी।  स्कूल जाने से मना कर रही थी। हम एरिका को नहीं समझ सकते ना ही उसके स्नेह को।  डांट डपट कर एरिका और वाणी को स्कूल भेज दिया। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 

और हां एक बात बताना मैं भूल गया चारों पीलें , बघेरा और स्नोई सभी सुनामी से भी घुलमिल गए थे। सुनामी माला और सुमित की विदेशी नस्ल की कुतिया। बड़ा डर लगता है उससे। स्नोई चारो पीलें और बघेरा सब उससे कब घुलमिल गए मालूम नहीं। अचरज होता था ये देख कर। 
*****
ख़ुश-ख़बरी!

'पाँच लिंकों का आनन्द' अपने सुधी पाठकों एवं रचनाकारों के लिये 'पाक्षिक लघुकथा' अंक आरम्भ करने जा रहा है। लेखक रचना की स्वरचित व मौलिक होने की घोषणा के साथ आगामी अंक में प्रकाशन हेतु भेज सकते हैं। लघुकथा पाक्षिक अंक में प्रकाशन हेतु लघुकथा भेजने की 

अंतिम तिथि: 30 जुलाई 2026 एवं प्रकाशन की तिथि 02 अगस्त 2026 

कैसे भेजें: ब्लॉग संपर्क फार्म के ज़रिये। 
आपके द्वारा लिखी गयी लघुकथाएँ 'पाँच लिंकों का आनन्द' पर प्रकाशित की जाएँगीं साथ ही वरिष्ठ ब्लॉगर एवं लेखक आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी के द्वारा प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा। 

लघुकथा और लघु कथा में अंतर है जिसे नीचे विस्तार से समझाया गया है।     

 हिंदी साहित्य के समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में'लघुकथा’ और ‘लघु कथा’ के बीच का अंतर केवल एक 'स्थान' (Space) या वर्तनी का नहीं है, बल्कि यह विधात्मक और संरचनात्मक अंतर है।

अक्सर आम भाषा में लोग इन्हें एक ही मान लेते हैं, परंतु साहित्य-शास्त्र और वर्तमान प्रयोग की दृष्टि से इनमें मौलिक भेद है।

 आधारभूत अंतर 

आधार                               लघुकथा                                                          लघु कथा

1.शब्द-विन्यास-                सामासिक संयुक्त शब्द है।                                         दो पृथक शब्द (विशेषण+विशेष्य)

2. विधागत स्थिति-            हिंदी-साहित्य की स्वतंत्र विधा।                                   यह कहानी विधा का एक रूप है। 

3. आकार/शब्द सीमा-      अत्यंत सूक्ष्म (सामान्यतः 100-500 शब्द)                     अपेक्षाकृत बड़ी (सामान्यतः 800-2500+ शब्द)

4. केन्द्र बिंदु-                     एक क्षण, एक बिंदु अथवा एक मारक विचार।            जीवन का विस्तृत फ़लक,चरित्र-विकास और घटनाक्रम। 

5. शिल्प/तकनीक-            अंत में यकायक प्रहार(Punch Line)                           क्रमिक विकास(प्रारम्भ,मध्य, चरमोत्कर्ष और अंत)

हिंदी-भाषी क्षेत्रों में लघुकथा यथोचित विकास कर चुकी है और पाठकों की रूचि की लोकप्रिय विधा बन चुकी है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:

(क) लघुकथा (एक शब्द /स्वतंत्र विधा)   

यह हिंदी साहित्य में पिछले पाँच-छह दशकों में तेज़ गति से विकसित हुई एक गद्य-विधा है।

 एकता और तीखापन: इसमें जीवन के किसी एक दृश्य, विचार या घटना का क्षणिक चित्र होता है। इसमें अनावश्यक विवरण, चरित्रों का लंबा परिचय या पृष्ठभूमि के लिए जगह नहीं होती।

 अंतिम प्रहार (Punch/Climax): लघुकथा की सबसे बड़ी पहचान इसका 'अंतिम वाक्य' या 'अंतिम विचार' होता है जो पाठक की संवेदना और चेतना पर गहरा प्रहार करता है।

 संकेतात्मकता: इसमें कम से कम शब्दों में बड़ी बात कही जाती है। व्यंग्य, प्रतीकात्मकता और संकेत इसके मुख्य हथियार हैं।

उदाहरण के लिए: यदि कोई रचना केवल 150 शब्दों में रिश्वतखोरी या सामाजिक विडंबना पर बिना किसी अनावश्यक विस्तार के तीखा प्रहार करती है और अंत में पाठक को सोचने पर मज़बूर कर देती है, तो वह लघुकथा है।

हिंदी-भाषी क्षेत्रों में लघुकथा यथोचित विकास कर चुकी है और पाठकों की रूचि की लोकप्रिय विधा बन चुकी है। 

(ख) लघु कथा (दो शब्द/छोटी कहानी)

यहाँ 'लघु' एक विशेषण (Adjective) है, जो 'कथा' (Story) की लंबाई या आकार को छोटा बताता है।

 आकार में छोटी कहानी: यह मूलतः 'कहानी' विधा ही है, जो आकार में थोड़ी छोटी होती है (जैसे औसत 1000 से 1500 शब्दों की कहानी)।

 विस्तार और चरित्र विकास: इसमें पात्रों का थोड़ा परिचय, पृष्ठभूमि का वर्णन, घटनाओं का उतार-चढ़ाव और विस्तृत संवाद शामिल हो सकते हैं।

 कथानक का फैलाव: इसमें जीवन के एक से अधिक पहलुओं या घटनाओं के प्रभाव को दिखाया जा सकता है।

 वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में स्थिति:

वर्तमान साहित्यिक परिवेश में इन दोनों रूपों को लेकर एक स्पष्ट विमर्श और प्रवृत्ति दिखाई देती है:

1. दिल्ली-एनसीआर (वैचारिक और पत्र-पत्रिकाओं का केंद्र)

लघुकथा की संगठनात्मक उपस्थिति: दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में लघुकथा के बाकायदा मंच, सम्मेलन और समर्पित पत्रिकाएं (जैसे लघुकथा वृत्त, सबलोगआदि में विशेष स्थान) मौजूद हैं।

 यहाँ लघुकथा को एक ऐसी स्वतंत्र विधा माना जाता है जो तत्काल सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं (जैसे- मीडिया का ध्रुवीकरण, महानगरीय अकेलापन, उपभोक्तावाद) पर त्वरित टिप्पणी करती है।

2. उत्तर प्रदेश (विधागत अनुशासन और बहस): उत्तर प्रदेश (लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, आगरा आदि) हिंदी साहित्य के सिद्धांतों का बड़ा केन्द्र रहा है।

  यहाँ के आलोचकों और लेखकों ने 'लघुकथा' और 'लघु कथा' के अंतर को रेखांकित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहाँ लघुकथा को "गागर में सागर भरने" की कला माना गया है, न कि केवल "किसी बड़ी कहानी का संक्षिप्त रूप।"

3. बिहार और झारखंड (सामाजिक यथार्थ और आक्रामकता)

  बिहार और झारखंड के आंचलिक और शहरी क्षेत्रों में लिखी जा रही लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ, जातिगत विषमता, भ्रष्टाचार और विस्थापन के मुद्दे प्रमुखता से आते हैं।

 यहाँ लिखी जाने वाली लघुकथाएँ भाषा की दृष्टि से अत्यंत सीधी, मारक और आमजन की भाषा के करीब होती हैं।

 निष्कर्ष

 यदि आप एक अत्यंत संक्षिप्त (100-400 शब्द), बिना किसी अतिरिक्त विवरण के, अंतिम वाक्य में गहरा प्रहार करने वाली स्वतंत्र विधा की रचना लिख या पढ़ रहे हैं, तो वह लघुकथा है।

 यदि आप एक ऐसी कहानी पढ़ रहे हैं जिसमें पात्र हैं, वातावरण का वर्णन है, घटनाक्रम का विकास है, लेकिन वह आकार में बहुत लंबी न होकर छोटी (800+ शब्द) है, तो वह लघु कथा (छोटी कहानी) है।

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फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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