पाँच लिंकों का आनन्द

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रविवार, 4 सितंबर 2016

415..... मै यहाँ तु वहाँ

नमस्कार दोस्तो
सुप्रभात 
आइए आज सीधे 
आज की प्रस्तुति की
ओर चलते है ....

नोयडा की हवाई इन्सानी बस्तियाँ
घर मानो हवा में तैरती कश्तियाँ
आस-पास कंक्रीट का जंगल
बची खुची जमीन पर गाड़ियों का दंगल
बाकी सब कुशल मंगल

सीमेंट की बीमों पर पक्षियों के घौसले
हवा में तड़पते तन्हा बच्चो के हौसले
हवा में फिजा में चहूँ ओर चोंचले
ऊँचाईयो का दस्तूर,फिजूल के फितूर
कायम है दिखावे का शगल



चाँद, कितने भोले हो तुम,
झील में घुसकर सोच रहे हो 
कि छिप जाओगे.

छिपे भी तो कहाँ ? पानी में ?
छिपने की सही जगह तो तलाशते,
अपनी आभा ही कम कर लेते,
आभा कम हो, तो छिपना आसान होता है.



एक दिन की बात है। दीपाली अपनी मां के साथ मंदिर जा रही थी। तभी रास्ते में उसे साेमेश दिखा। सोमेश की नज़र भी दीपाली पर पड़ी, पर वह उससे अनजान बनता हुआ एक गली में चला गया। दीपाली का मन हुआ कि वह भाग कर जाए और सोमेश को पकड़ कर झकझोर दे। पर मां की वजह से वह जब्त कर गयी। पूजा से लौटने के बाद दीपाली ने शाम को मोबाइल रिचार्ज कराने का बहाना किया और उसी गली में जा पहुंची, जिसमें सोमेश गया था।



“ पगडंडियों का जमाना है “
  बड़े दूरदृष्टा थे
  पहले ही भांप गए
  आने वाला कल कैसा है ?



यह वक्त.. ये दिन ... ये रात.... गुजर तो रहे हैं 
लेकिन गुजारे नहीं जाते ........ तुम्हारे बिन...

मैं यहाँ तू वहाँ, फासले दरमियाँ
आती जाती पवन ,कह रही दास्ताँ |

गुजरती ही नहीं, तेरे बिन जिंदगी 
इस जहाँ से परे ,बस गए तुम कहाँ |

ढूँढती है नजर, हरसू बेचैन सी
कुछ कहूँ चुप रहूँ, खो गया हमनवाँ |


 अब दीजिए 
आज्ञा 
सादर


5 टिप्‍पणियां:

  1. शुभप्रभात...
    बहुत सुंदर....
    लगे रहो...
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुप्रभात..,मेरी रचना "सवाल"अपने संकलन में स्थान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद विरम सिंह जी .

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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