पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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रविवार, 22 मई 2016

310......तुझे ये चाँद क्या तौफ़ीक़ देगा

सादर अभिवादन
आज से पाँच दिन
मेरा है सिर्फ..मेरा,,
भाई कुलदीप
प्रशिक्षण लेने प्रवास पर हैं
विरंम भाई ने आँखें नही खोली
अब तक
और संजय जी
व्यस्त हैं

आज को आनन्द का आगाज एक देशगीत से



शैल रचना...शैल सिंह
कहीं  लग  न  जाये  आग  घर  के चराग़ से
खा  न  जाएँ  मात  जयचन्दों  के  जमात से
वहशी आँधियाँ बहा न लें  अपने मिज़ाज से
जागो  नौजवानों  देश  के,अबेर न  हो जाये
भरके जोश-ज़िस्म खूने-जुनूँ  देर न हो जाये ,

जिन अंधेरों से बचकर भागता हूँ
हमदम हैं वो मेरे।
जिनके साथ हर पल मैं जीता हूँ
और मरता भी हूँ हर पल
कि आखिरी तमन्ना हो जाए पूरी।

लम्हों का सफर...डॉ. जेन्नी शबनम
इश्क़ की केतली में  
पानी-सी औरत और  
चाय पत्ती-सा मर्द  
जब साथ-साथ उबलते हैं  
चाय की सूरत  
चाय की सीरत  
नसों में नशा-सा पसरता है  


कुछ अलग सा.....गगन शर्मा
किसी काम को नीचा दिखाना, मेहनत-मशक्क्त करने वालों की तौहीन है
दादा भाई नारौजी गरीब परिवार से थे उस पर सिर्फ चार साल की उम्र में उनके पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी माँ ने उन्हें कैसे पाला होगा इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है। हमारे पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बेहद साधारण परिवार से थे। लाल बहादुर शास्त्री को कौन नहीं जानता, पैसों की कमी की वजह से कई बार वे तैर कर नदी पार कर पढ़ने जाते थे। हमारे सबसे लायक राष्ट्रपति कलाम साहब को बचपन में अखबार का वितरण करना पड़ा था। ऐसे नाम कम नहीं हैं सरदार पटेल, गोपाल कृष्ण गोखले, जगजीवन राम, कामराज जैसे नेताओं का जन्म साधारण परिवारों में हुआ बचपन अभावों में बीता पर उन्होंने अपनी लियाकत से देश और अपना नाम ऊंचा किया

दादी हमारा इंतजार किस शिद्दत से करती थीं ये हम इसी तरह जान पाते थे कि उन्हें बाँहों में भरकर प्यार करना आता नहीं था, वो बस चुपके चुपके ख्याल रखते हुए प्यार करना जानती थीं. हमारे इंतजार में वो तरह तरह के अनाज को भाड में भुंजवा के रखा करती थीं. ज्वार, बाजरा, चना, लाई, मूंग, गेंहू, जुंडी और न जाने क्या क्या...सारा दिन मुंह चलता रहता था. 

उस छोटे से स्‍टेशन पर 
भीड़ को धकि‍याते 
एक हाथ में अपना ट्राली बैग थामे 
बेताब नजरों से 
जब भी ढूंढते दि‍खते थे मुझको 
मैं छुप जाती थी 
तुम्‍हारी नजरों की बेचैनी देख 
अनजाना सा सुकून मि‍लता था मुझे। 


आज की शीर्षक कड़ी..

रचना संसार...अखिल
मेरा हर जश्न हर त्यौहार है तू।
मेरी पूजा तू मेरी आरती है।।

तुझे ये चाँद क्या तौफ़ीक़ देगा।
तू ख़ुद उस चाँद से भी कीमती है।।

...........
दें इज़ाज़त यशोदा को
और सनिए ये गीत...



7 टिप्‍पणियां:

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