निवेदन।


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मंगलवार, 27 जनवरी 2026

4635....मौसमी देशभक्त बनने के लिए

जिन लोगों में आत्म-बोध की प्रबल भावना होती है, वे अपनी शक्तियों और कमजोरियों के प्रति अधिक जागरूक होते हैं, अधिक आत्मविश्वासी होते हैं और उनमें उच्च आत्म-सम्मान होता है ।  इसके विपरीत, जिसकी व्यक्तिगत पहचान संरचना जितनी अधिक फैली हुई है, व्यक्ति उतना ही अधिक भ्रमित प्रतीत होता है और उनका आत्म-सम्मान उतना ही कमजोर होता है।
व्यक्तिगत पहचान का निर्माण और विकास समाज, परिवार, दोस्त, जाति, नस्ल, संस्कृति, धर्म, स्थान, रुचि, , बौद्धिक स्तर,आत्म-अभिव्यक्ति और जीवन के अनुभवों जैसे विभिन्न आंतरिक और बाह्य कारकों से प्रभावित होता है।
एक प्रश्न है मेरा
पर क्या आपने
अपने अस्तित्व को
चिन्हित करते सारे आभूषण
उतारकर कभी 
स्वयं को पहचानने के प्रयास किया है?
स्वयं पर लगे नाम,उपनाम,जाति,
धर्म,शहर,गाँव के स्टीकर को अलग करके
पहचानने का प्रयास किया है?
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आज की रचनाऍं- 

मैं रोज़
थोड़ा-थोड़ा छूटती रही।
मैंने तुम्हें
पीठ फेरते नहीं देखा,
मैंने तुम्हें
मेरे भीतर से
खिसकते हुए देखा है।
स्त्रियाँ
दूरी कदमों से नहीं नापतीं,
हम दूरी
बदलते स्पर्शों से पहचानती हैं।



कारण-ए-मौत को
परिस्थितिजन्य लिख देना,
और परिस्थितियाँ
हम तय करेंगे।

खून अगर सड़क पर फैला हो
तो लिखना
नमूने सुरक्षित नहीं थे।

आँसू अगर गवाह हों
तो लिखना
भावनात्मक साक्ष्य अमान्य है।



वैसे भी स्वामी विवेकानंद बहुत ज्यादा दिनों तक एक जगह पर नहीं रहते थे। पैदल, रेल या बस से वह यात्रा किया करते थे। वह पूरे भारत का भ्रमण करके देश की दशा को समझना चाहते थे। एक स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रुकी, तो दो अंग्रेज अफसर उस डिब्बे में चढ़े जिसमें स्वामी विवेकानंद बैठे हुए थे। वह दोनों अंग्रेज एक महिला के बगल में बैठ गए। उस महिला की गोद में बच्चा था। 




दोहे-चौपाई, कलमा, ख़ूब रटे, पर पलटे नहीं संविधान के पन्ने,

बस इतना ही काफ़ी है हमारा मौसमी देशभक्त बनने के लिए।



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 26 जनवरी 2026

4634...गर्व से कहें हम सब एक हैं, दुनिया को ये दिखाएँ...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गणतंत्र दिवस के 77 वें उत्सव की शुभकामनाएँ।

चित्र साभार: गूगल

26 जनवरी 1950 का दिन हमें पूर्ण स्वतंत्रता को स्मरण कराता है जब हमारा संविधान इस तारीख़ से लागू हुआ था। 76 वर्ष के लंबे अनुभव में भारत ने दुनिया के समक्ष अपनी मज़बूत स्थिति को गर्व के साथ रखा है। सामरिक दृष्टि से मज़बूती के तौर पर भारत दुनिया की आणविक हथियारों की क्षमतावाली शक्तियों-महाशक्तियों (भारत के अलावा अमेरिका,रूस,चीन,फ़्रांस,ब्रिटेन,इज़राइल,पाकिस्तान और उत्तर कोरिया) में उल्लेखनीय रूप से शामिल है.

भारत अपनी आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षमताओं के लिये विश्व विख्यात रहा है किंतु आज भारत के समक्ष विकराल समस्याओं के रूप में जनसंख्या वृद्धि, बेरोज़गारी,सामाजिक विषमता, शिक्षा की  गिरती गुणवत्ता, स्वास्थ्य क्षेत्र में सीमित संसाधन और ढाँचागत कमियाँ, ग़रीबी जैसे मुद्दे समाधान की राह ताक रहे हैं। युवा ऊर्जा का सदुपयोग करने हेतु नवीनतम आयामों को विकसित करना और देश की एकता व अखंडता के लिये नागरिकों को सक्षम और सशक्त बनाना बड़ी चुनौतियाँ हैं।

आज के दिन केवल महापुरुषों के योगदान और स्वतंत्रता के संघर्ष में राष्ट्रीय आंदोलन को याद करना मात्र हमारा लक्ष्य नहीं है बल्कि हम अपने देश के लिये सदैव समर्पित होकर कर्तव्य पथ पर डटे रहें।

'पॉंच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से आप सभी को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय प्रस्तुति में आज पढ़िए गणतंत्र दिवस के उत्सव से जुड़ी रचनाएँ-

आओ मिलकर अलख जगाएँ: गणतंत्र दिवस पर एक विशेष देशभक्ति गीत

शपथ उठाएँ उन वीरों की, जो सीमा पर लड़ते हैं,
मातृभूमि की रक्षा में जो, हँसकर प्राण चढ़ाते हैं!
यही समर्पित श्रद्धांजलि हो, उन अमर सपूतों को,
सर्वोपरि हो देश हमारा, यही संकल्प दोहराते हैं!
गर्व से कहें हम सब एक हैं, दुनिया को ये दिखाएँ
*****

एक देशगान -संविधान का गर्व तिरंगा

संविधान का गर्व तिरंगा

भारत का अभिमान है.

एक -एक धागे में इसके

वीरों का बलिदान है.

*****

बहे अटूट प्रेम की धारा

पावन संस्कृति अति पुरातन

विश्व साथ दे हर उत्सव में,

भजन क्लबिंग कर युवा आज के

भक्तिभाव जगायें उर में!

*****

देश मेरा सरताज है बना

नीला आसमान है

हरी है वसुंधरा

बिखरा वैभव देश में

सोना सा खरा .

*****

सरस्वती पूजा

कंठ में पहने देवनागरी की वर्णमाला

सुगंधित सतरंगी कुसुम कली मुक्ता मणि

कर में धारण कर कमल और जपमाला,

करकमल में कलम से लिखी स्नेह पाती

 चित्रकला, नृत्य, नाट्य की वरद हस्तमुद्रा।

*****

श्रद्धांजलि

मधुर आवाज़, कोमल भावों के शायर ताहिर फ़राज का मुंबई में निधन, प्रशंसकों में शोक

सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को
फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी

ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार
घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

रविवार, 25 जनवरी 2026

4633 मजबूत मजबूर मशहूर और मगरूर किसका कौन सा दिन है

 सादर अभिवादन 
सप्ताह का एक दिन है, जो शनिवार के बाद और सोमवार से पहले आता है,   और यह सूर्य देव (सूर्य) को समर्पित एक शुभ और महत्वपूर्ण दिन है, 

भाई रवींद्र जी को आना था
खैर कोई बात नहीं
आप तो हैं..चलिए चलते हैं




आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती
ठूंठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती
लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  ।






सारा   बोझा   बंद   आँखों   में   उतारकर
झील   के    उस   किनारे   का   इंतजार
तरंग    उछलते   कंकड   ढूँढे    न    अब
कोई   प्रश्न   नाही   उत्तर   की    दरकार 
मेरा   होना   भी  एक   भूल   लागे   जब
नयन    समक्ष   दर्पण   मन   का   निहारे






सबसे पीड़ित व्यक्ति 
अपनी पीड़ा की बात नहीं सुनेगा 
उसके सामने दूसरे की पीड़ा को 
मनोरंजन बनाकर परोस दिया जायेगा  
वो अपनी भूखी अंतड़ियों को 
बांधकर
हिंसा के दृश्यों में उगाये गए 
आनंद के सागर में गोते लगाएगा।   





कूल-किनारे हरियाली हो ।
अन्तर कोश नहीं खाली हो ।
नदिया का अविरल प्रवाह ,
निर्मल , कल कल स्वर दे
मन जगमग जग करदे ।





गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया—
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?
क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?





मजबूरियाँ
मगर
नजर आई हैं
समझ में भी आई हैं

कुछ
करने के लिये
सच में
चाहिये होता है
एक बहुत बड़ा
विशाल कलेजा

वो कभी ना
हो पाया है
ना ही लगता है
कभी हो पायेगा
जो कर पाये
अपने आसपास
के झूठों से
सच में प्रतिकार  



आज बस
सादर वंदन

शनिवार, 24 जनवरी 2026

4632 ..सब तो हो ही रहा है न, अब भी तुम्हारे बिना भी

सादर अभिवादन 

लगभग एक महीने के अंतराल के बाद
सोच रहा था कोई चमत्कार होगा
वो आकर प्रस्तुति लगा जाएगा
पर जादू तो सिनेमा में ही होता है
यहां तो काम करना पड़ता है
चलो शुरू हो जाओ...


.... सब तो हो ही रहा है न अब भी
तुम्हारे बिना भी
नहीं रुकी है यह दुनिया किसी बिना भी
हमे ही यह अहम और वहम होता है 
कि हम ही हैं सब कुछ
दिया जाता है इतना दबाव, प्रभाव और तनाव
लगता है चौबीस घंटे हम न रहें तो सब थम जाएगा..
अपने आप पर ही आने लगता था गुस्सा
क्या जरूरत थी बीमार होने की
अब मन की सोच यही है कितना 
सारा सुकून खोया है मैंने
और बदले मे पाया बस एक वाक्य
"आपकी जगह कोई नहीं ले सकता"



बस तकलीफ मुझे हो रही थी, 
तुम्हें आराम जो देना था सो आपको
गया जी के गद्दे पर आसीन कराया और 
एक घड़ा जल प्रयागराज  
से लाकर आपके बगल में रखा
आराम से रहिए..




यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।

यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।




ज़रूर जान गयी कि
पत्थर कभी फूल से 
मुलायम नहीं होते  
इस धरती पर कभी
चमत्कार नहीं होते !




निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, 

इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, 
पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    




इन वासंती हवाओं के टूटे पत्ते
बुलाते रास्ते पर आज भी मिल जायेंगे 
उसी ताजगी के एहसास को लिए भोर में 
अपनी महक को घोलते हुए कलियों के पहरुए
वे कपोलें नव पिछली बार देखे थे 





पौष-माघ की ठिठुरन में
है गरम रजाई माँ
तपती जेठ दुपहरी में
ठंडी अमराई माँ ।





कोई नहीं जानता 
कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,
पर इतना तो तय है 
कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,
कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,





उसी रात उसे अपने बचपन की याद आ गई—दुकानों वाली गली, सुबह का कोहरा, और एक छोटा-सा चाय का ठेला चलाने वाला बुजुर्ग दंपती। लोग उन्हें “चाय वाली अम्मा” और “सुनार बाबा” कहते थे। वे खून के रिश्तों से नहीं, मगर मोहब्बत से सबके अपने बन गए थे। उनका कोई अपना नहीं आता था, फिर भी पूरा कस्बा उनका परिवार था। एक दिन चाय वाली अम्मा चली गई, और ठीक एक महीने बाद सुनार बाबा भी। तब कस्बे ने ही उनका अंतिम संस्कार किया, उनकी याद में रोया। उस छोटी लड़की ने पहली बार समझा था—खून का रिश्ता ही सब कुछ नहीं होता। सुबह होते ही वह युवती फिर उसी जगह गई, बूढ़े बाबा को खोजने



गरीब के हिस्से में आया तो
सिर्फ़ इंतज़ार, सिर्फ़ संघर्ष,
और फिर वही उम्मीद,
जो रोज़ शाम को थककर
उसकी पलकों पर सो जाती है।

जीवन के कितने ही बसंत
इंतज़ार में बीत गए,
पर उसके जीवन में
अब तक बसंत नहीं आया।


आज बस
सादर वंदन

काफी दिनों के बाद प्रस्तुति लगा रहा हूँ
कुछ भूला-भटका सा लग रहा है
हो सकता है कोई प्रस्तुति दुबारा लग गई हो
तो भी पढ़ लीजियेगा

अगर कसमें सच्ची होती हो 
तो तो सबसे पहले खुदा मरता


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

4631.... तुम्हारी सोच तय करती है...

 शुक्रवारीय अंक में 

आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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वन्दे सदा चेतसा ज्ञानशक्तिम्
हृदय से सर्वदा ज्ञानशक्ति प्रदात्री सरस्वती की वंदना करती हूँ।
ब्रह्मरूपिणी,सर्वव्यापिनी,चर-अचर मूढ़ जगत में 
बुद्धिरूपिणी देवी माँ सरस्वती को शत-शत नमन।

मानसिक प्रदूषण से रक्षा करने वाली देवी के आगमन से 
संपूर्ण प्रकृति उल्लासित और श्रृंगारित होने लगती है।
वृक्षों में नूतन किसलय,चित्ताकर्षक पुष्पों की सुवासित छटा,
आम्र मंजरियों से लदी अमराई में कोयल की कूक 
एवं भ्रमरों के गान, सरस रागिनी प्रकृति सौंदर्य 
को सुशोभित करते हैं, बसंती हवाओं की सुगंध कण-कण 
में बिखर जाती है। हर्षित धरा का गान हृदय में 
प्रेम और पवित्रता का संचार करते है। जग के झमेले 
से हटकर अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकालकर 
आप भी प्रकृति के उत्सव को महसूस कीजिए।

साहित्य के बसंत महाप्राण निराला जी की पुण्य स्मृति को सादर नमन।
 मुक्त छंद (स्वच्छंदता) के प्रवर्तक, व्यक्तिगत सुख-दुख की मार्मिक अभिव्यक्ति, प्रकृति चित्रण, क्रांति और विद्रोह की चेतना, सामाजिक यथार्थ का चित्रण (शोषितों के प्रति सहानुभूति), रहस्यानुभूति, आत्म-गौरव, ओज और औदार्य तथा भाषा की विविधता (सरल से संस्कृतनिष्ठ तक) सूर्य कांत त्रिपाठी निराला के लेखन की प्रमुख  विशेषताएं हैं, जो छायावाद से प्रगतिवाद तक के सफर को दर्शाती हैं।

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आज की रचनाऍं- 

प्रेम
किसी पुराने स्वेटर की तरह है
जो अब पहना नहीं जाता
पर फेंका भी नहीं जाता
ठंड अचानक बढ़ जाए
तो वही
सबसे पहले याद आता है




ज़रूरी है युद्ध
क्योंकि शांति के नाम पर
हर असहमत आवाज़ के सामने
हादसों के गड्ढे तैनात किये जा रहे हैं.
इसलिए
यह कोई नारा नहीं,
कोई उत्सव नहीं।

बस इतना जान लो
ज़रूरी है
यह युद्ध।




तुम ही तुम सजने लगे ख्यालों ख़्वाबों में ऐ सनम 
बदला चाल ढाल रंग ढंग खुद पर नाज़ हो गया है 
दिन हसीं रंगीन शामें लगने लगीं आजकल सनम 
उड़ने लगी मैं हवा में जबसे तूं सरताज हो गया है ।



याद रखना…
ज़िंदगी तुम्हें नहीं तोड़ती,
तुम्हारी सोच तय करती है
कि तुम टूटोगे या बनोगे।

Problem बड़ी नहीं होती,
हम उसे देखने का Angle छोटा कर देते हैं।

जब तुम कहते हो –
“मुझसे नहीं होगा”
तो ज़िंदगी भी कहती है –
“ठीक है, जैसा तुम चाहो।”


नीट की छात्रा......


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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