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शनिवार, 28 जून 2025

4433 ... जीवन के पथ पर बहुत कुछ सीखा और समझा है

 सादर अभिवादन

माह का अवसान हो रहा है
27 जून से लेकर 30 जून तक बैंक बंद रहेंगे। लिहाजा अगर आपका बैंक से जुड़ा कोई काम है 
तो उसे आज ही निपटा लें। हालांकि इस दौरान कुछ राज्यों के बैंक ही बंद रहेंगे। 
जैसे शुक्रवार को ओडिशा में बैंक बंद रहंगे। वहीं 30 जून को मिजोरम में बैंक बंद रहेंगे।

देखिए एक झलक




तेज बहती हवाएँ, दिल का इम्तिहान लेती हैं
जड़ बने पत्थर, भीगते हुए कुछ कहती हैं  
सिसकियाँ बह गयी पानी संग, दर्द जो काफी है  
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है





जीवन के पथ पर बहुत कुछ सीखा और समझा है
खुश रहने के लिए चीज़ें नहीं चंद खास की ज़रुरत होती है !

कम हैं दोस्त और दोस्ती भी कहाँ है आजकल किसी से
बस 'फ़िज़ा' रिवायतें है जो निभाई जाती हैं मज़बूरी में जैसे !






दूर-दूर तक धूल उड़ाती
चौड़ी सपाट सड़के,
शांत पड़ी रह गई,
जब बारिश की बूंदों ने असमय
ही उन्हें भींगो दिया..





जीवन इक उपहार अनोखा
तन, मन, मेधा वाहक जिसके,
श्वास-श्वास में वही गा रहा
वही छिपा है चेतनता में !




क्या लिखा और क्या है बाक़ी
हिय की भाषा हिय ही जाने
शब्दों में रचे समर्पण का
हर मूल्य आस्था पहचाने
भूखे-प्यासे निर्वात नयन
मैं नीर क्षुधा बरसा बैठी
तुम अपनी गागर भर लेना






प्रेम परिभाषित नहीं हो सकता
क्योंकि
वह
जिंदगी पर नेह से
उकेरा गया
महावर है
जिसका अर्थ
एक स्त्री से अधिक कोई नहीं समझ सकता।

*****
कल 27 जून को रथयात्रा थी ,
हमारे ब्लॉग की सालगिरह
सादर आभार सखी श्वेता को
अविस्मरणीय अंक दिया हमें
पन्ना पलट कर पढ़िएगा
सादर
*****
आज बस
सादर वंदन

गुरुवार, 20 मार्च 2025

4433...मन चंगा तो कठौती में गंगा!

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया नूपुरं जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए विभिन्न ब्लॉग्स पर सद्य प्रकाशित पाँच रचनाएँ-

अफ़सोस कि सद्य रचनाएँ लिखने की मेरी समझ की संभावना पर तुषारापात हुआ क्योंकि ब्लॉगर रीडिंग सूची में प्रस्तुति तैयार करते समय 19.03.2025 सांय 6 बजे तक केवल एक रचना 'स्वर्ण-विहान' ही नज़र आई। लगता है ब्लॉग-जगत का दिवाला निकल चुका है!

मुट्ठी भर की गौरैया

छपाक-छपाक खूब नहाना!

मन चंगा तो कठौती में गंगा!

तिनके जोङ नीङ बनाना!

चारों दिशाओं में चहचहाना!

*****

एकाकीपन

तेरी तरह

जब कोई गलतियों पर

न हो नाराज

तेरी तरह

जब कोई टोके नहीं

घर से बाहर निकलते हुए

मेरी तरह

यह आजादी नहीं

एकाकीपन है!

*****

स्वर्ण-विहान

रंग - बिरंगे  फूल खिलें है,

मुख पर ले मुस्कान।

रंग- बिरंगी उड़ी तितलियाँ,

कर  रहे  रस  पान।

*****

लड्डू गोपाल जी के संरक्षण में चल रही एक मिठाई की दुकान

जबलपुर के नेपियर टाउन में रहने वाले ऐसे ही एक प्रभु भक्त हैं, विजय पांडे जी। उनका मिठाई का कारोबार है। उनकी बचपन से ही श्री कृष्ण जी के बालरूप लड्डू गोपाल में गहरी आस्था व श्रद्धा है। चौबीस घंटे खुली रहने वाली उनकी दुकान 2014 से मंदिरों और पूजास्थलों के साथ-साथ श्रद्धालुओं की मांग पूरी करती आ रही है। पर उस दूकान में ना हीं कोई मालिक है, ना हीं कोई विक्रेता है, ना हीं कोई कैशियर है, ना हीं कोई सुरक्षा कर्मी ! यह दुकान पूरी तरह से विश्वास और ईमानदारी पर टिकी हुई है और पूरी तरह से भगवान के भरोसे चल रही है। यहां आने वाला हर ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार मिठाई उठाता है और पूरी ईमानदारी से पैसे रखकर चला जाता है।

*****

दुआ की ताकत

विदा होकर आई नव-वधू इस सब चिन्ताओं से अनभिज्ञ ऊपर की मंजिल पर अपने कमरे में अकेली बैठी खिड़की से बाहर झांक रही थी। सहसा उसकी दृष्टि बाहर खेत में गई तो देखा खेत में घास काट रही एक गरीब स्त्री प्रसव पीड़ा से जमीन पर पड़ी छटपटा रही है, उसका मन विचलित हो गया पर आसपास कोई नहीं, नया घर, किसी को जानती नहीं तो संकोचवश विवश होकर चुपचाप देखती रही।

 *****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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