सादर अभिवादन
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
सोमवार, 20 अक्टूबर 2025
4546 ...लक्ष्मी-गणेश पूजन , शुभ समय शाम 7 बजकर 08 मिनट से रात 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगा
रविवार, 19 अक्टूबर 2025
4545..और दर्पण टूटने से बच गया
सादर अभिवादन
अवश्य पढ़िए और सदस्य भी बनिए
शनिवार, 18 अक्टूबर 2025
4544 ..आग से खेल नियम हैं जल और जला धरम है किताबों में नहीं लिखा है
सादर अभिवादन
रुप चौदस की ओर
शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025
4543... मुक्ति की आकांक्षा...
गली,मुहल्ला,चौबारा,झोपड़ी, फ्लैटों,घरों
पर सजे रंग बिरंगे बिजली
की झालरों की आभा किसी
परीलोक का आभास देने
लगे हैं। दिवाली की साफ-सफाई और
सजावट से हर घर मुस्कुरा रहा है।
कामकाजी है तो समयाभाव होना स्वाभाविक है।
सरदर्द लेना नहीं चाहती हैं ज्यादा।अब
कौन मिट्टी के दीये को भिगोकर , सुखाकर,
बाती बनाकर तेल भर कर जलाये और एक-एक दीया की बाती बार-बार ऊसकाये, तेल चेक करते रहे..
इतना झंझट कौन करे? फिर अड़ोसी-पड़ोसी का घर
चाइनीज़ बल्ब से झलमला रहा है,चकाचक है।
खूबसूरत झालर खरीदकर लटका दो बालकनी में,
छतों की मुंडेर से और लाईट ऑन कर
दो बस हो गयी दिवाली।
में तो आज भी मिट्टी के दीपक को जलाना
पवित्र माना जाता है और पारंपरिक
दीये ही जलाये जाते हैं।
साज-सज्जा का प्रयोग कर लें पर अपने अंतर्मन को
शुद्ध और पवित्र प्रकाश से आलोकित करें जिसमें
सारी कलुषिता और अंधकार लोप जाये।
कभी दुआ बनकर ठहर जाती है होंठों पे।
कभी खामोशियों में भी बोल उठती है,
कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास दिलाती है
कौन पीड़ा के बीज बोता
कौन अहंकार जगाता
कौन करता मुक्ति की आकांक्षा
कौन ठगा से देखता रहा जाता!
बिनआँसू सुई सी चुभती सीने दिल टूटे अरमानों की ll
समय अकेला समर गहरा संबंध विच्छेद नादान सा l
कटाक्ष बाण चक्रव्यूह रण निगल गये निदान काल सा ll
गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025
4542... तुम क्यों न गई देहरी के उस पार? ,बुद्ध गए हैं जहाँ
सादर अभिवादन
बुधवार, 15 अक्टूबर 2025
4541 ..ग़ज़ब की अप्सरा जब आई क़रीब करंट सा मुझ को सहसा लगा
सादर नमस्कार
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025
4540.... गिरकर उठते वीर...
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
खिड़की के पास बैठा
कॉफ़ी की भाप में सुकून ढूँढता हूँ,
सोचता हूँ,
कितना अजीब होता है ये मौसम —
कुछ लौटाता नहीं,
पर सारे लम्हें
संजोये बैठा रहता है ...
एक गर्भनाल से
बाँध कर रखती रही है
हमें..,
जब से तुम्हारे समय की गठरी की
गाँठ खुली है
हम एक-दूसरे के लिए अजनबी
से हो गए हैं
ठोकर से डरना नहीं, गिरकर उठते वीर ।
करते रहो प्रयास नित, रखना मन मे धीर ।।
4. पथबाधा को देखकर, होना नहीं उदास ।
सच्ची निष्ठा से सदा, करते रहो प्रयास ।।
आत्मज्योति में भी सात गुण छिपे हैं
कभी प्रेम का लाल रंग
मुखर हो उठता है चिदाकाश में
जब भावनाओं के श्वेत निर्मल मेघ
उमड़ते घुमड़ते हैं
कभी शांति का नीलवर्ण
शक्ति का केसरिया भी है यहाँ
और ज्ञान का पीतवर्ण भी
शायद इंद्र का व्यवहार पहले भी ऐसा ही रहता होगा तभी ऋषि मुनियों के साथ देवताओं से भी उनकी खटपट चलती रहती थी। इसलिए इस साल कांस के फूलों को बारिश की फुहारों के बीच लहराते रहना पड़ा। वो तो अपने समय से फूले पर इस बार बारिश की विदाई के लिए नहीं पर उनके द्वारा लाई हरितिमा के साथ कदम ताल करने के लिए।
मिलते हैं अगले अंक में।


















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