सादर अभिवादन
दीवाली उत्सव प्रारंभ
अपने समय से आई, हवा पानी के संग
आज धनतेरस है
समृद्धि और स्वास्थ्य का पावन पर्व धनतेरस, दीपावली के पावन पर्व का प्रारंभिक द्वार,
भारतीय संस्कृति में समृद्धि, स्वास्थ्य और सौभाग्य का प्रतीक है।
यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है,
जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर के मध्य में आता है।
धनतेरस का नाम स्वयं इसकी महत्ता को उजागर करता है—
'धन' अर्थात धन-धान्य और 'तेरस'
चलिए चलें मनाएं दिवाली और आगे बढ़ें
रुप चौदस की ओर
रुप चौदस की ओर
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पतझड़ सा विरान था जीवन मेरा
वसन्त सा मेरे मन का उपवन कर
पूरवा के झोंके सा उर में समा गये
मंडराते रहते भंवरे सा गुनगुन कर
रहे मूक अधर कर संवाद नयन से
छलका प्रीत का सागर मन में बैठे
उगा के बंजर उर में प्रेम का अंकुर
फिर क्यों सख्त पहाड़ सा बन बैठे ।
दवा की जगह वे जहर रखेंगे
हालात पे फिर वे नजर रखेंगे
यूँ तो हौसला देंगे दौड़ने का
मगर रास्ते में वे पत्थर रखेंगे
खबरों के लिए ही संग चलेंगे
नजरों में पर वे नश्तर रखेंगे
शादी के बाद हम काट दी गयी
जड़ों से
ससुराल और मायके हर जगह
कुछेक बातों के लिए
तो कभी कुछेक आघातों के लिए,
कभी असीम प्रेम बना कारण
समय की सांसों पर
स्मृतियों के शैवाल उग आए हैं;
वे शैवाल,
हरे हैं — पर थके हुए,
जो अब धीरे-धीरे
एक कोरी
शिला बनते जा रहे हैं।
कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि यदि फ्रांस क्रांति न हुई होती, तो शायद नेपोलियन का उदय नहीं हुआ होता। एक बार की बात है। नेपोलियन की सेनाएं युद्ध लड़ रही थीं। नेपोलियन अपने शिविर में बैठा हुआ आगे की रणनीति पर विचार कर रहा था कि तभी एक सैनिक सेनापति का संदेश लेकर उसके पास पहुंचा। सैनिक काफी दूर से आाया था
आग से खेल नियम हैं
जल और जला धरम है
किताबों में नहीं लिखा है
दीवारों पर लिख
नया कानून लिखा जाए
आज बस
कल फिर



