सादर अभिवादन
"पुनः बसंत लिखूँगी" का अर्थ है "फिर से बसंत लिखूंगी". इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति बसंत ऋतु के बारे में या बसंत ऋतु से प्रेरित होकर कुछ लिखने का इरादा रखता है। यह एक खूबसूरत वाक्यांश है जो बसंत के आगमन और उसके सौंदर्य को दर्शाता है।
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रजनीगंधा और रेन लिली दोनों ही खूबसूरत फूल हैं, लेकिन ये अलग-अलग पौधे हैं। रजनीगंधा एक सुगंधित, बारहमासी पौधा है जो अपने तीव्र सुगंधित, मोमी सफेद फूलों के लिए जाना जाता है. जबकि रेन लिली, जिसे ज़ेफिरैन्थस के नाम से भी जाना जाता है, भारत में मानसून के मौसम में खिलने वाले छोटे, क्रोकस जैसे फूल हैं.
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यह एक सामान्य कहावत है जिसका अर्थ है कि बीता हुआ समय वापस नहीं आता, या एक बार उम्र बढ़ने पर आप वापस युवा नहीं हो सकते। यह वाक्यांश अक्सर इस बात पर जोर देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि हमें अपने जीवन के हर पल का सदुपयोग करना चाहिए, क्योंकि समय लगातार बीतता रहता है।
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यदि आप पानी देखना चाहते हैं, तो तालाब की सतह से मैल हटा दीजिए। आँखों पर माया की परत चढ़ी होने के कारण आप शिकायत करते हैं कि आप ईश्वर को नहीं देख सकते। यदि आप ईश्वर को देखना चाहते हैं, तो अपनी आँखों से माया की परदा हटा कर देखिए
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देखें कुछ रचनाएं
आग नफरतों की जब फैली
दावानल में देश जल उठा,
राजसभा जनसभा, फर्क क्या
चीरहरण का दृश्य वही था ।
अब पांचाली के हाथों से
दुर्योधन का अंत लिखूँगी !
मैं तो पुनः बसंत लिखूँगी !
रजनीगंधा की भीनी ख़ुशबू
और रेन लिली की गुलाबी चमक
छा गई कहीं भीतर तलक...
बारिश भी आई
बस तुम्हारी ख़ुशबुओं की तरह...
अल-सुबह उठ के गुलशन में आए हो क्यूँ,
फूल खिलने लगे हैं हर इक डाल में.
तैरना-डूबना तो है सब को यहाँ,
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जोग विचार भगवन को जाहि लगावै भोग l
सातिक भोजन ताहि सब कहत पुकारे लोग।।
माया मछुआरिन भइ भए भव बंधन जाल l
आन मीन सम जौ फसे ग्रसे तिनन्ही काल l।
सच जो रेंगते भी है समय की पीठ पर
बरसों तक।
सोचिएगा
कोई चेहरा न होना ही बेहतर है
चेहरे पाकर
हम उसी के होकर रह जाते हैं।
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अच्छी थी, पगडंडी अपनी।
सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।
फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।
सबके पास, काम बहुत है।।
नहीं जरूरत, बूढ़ों की अब।
हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।
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आज बस
सादर वंदन
