सादर अभिवादन
रिश्वत अकेले नहीं आती
देने वाले की बद्दुआ
मजबूरियां, दुख,
वेदना, क्रोध, तनाव,
चिंता भी उन नोटों में
लिपटी रहती है ...
अब रचनाएं देखें
कोई तो उतारे बोझ
हल्का हो मन उड़े,
एक बार बिना भार
ख़ुद से फिर आ जुड़े !
मुझसे ही है तुम सबका जीवन।
मुझसे है खेती,वन और उपवन।
अपने जन को तुम समझा लो।
मानव तू मेरा अस्तित्व बचा लो।
फिर भी
कुछ किताबें
नहीं दी जा पाती हैं
किसी को भी
न किसी पढ़ने वाले को
न पुस्तकालय को
न रद्दी वाले को
तब तो और भी नहीं
जब हो वह किताब
अधपढ़ी।
ज्ञान उसे मत दीजिये,
जो नहि ग्राहक होय।
जिमि वर्षा मरु भूमि में,
तृण उपजे नहि कोय।।
बेटी तो अपनी मासूमियत के साथ और भी बतियाती रही । पर माँ को जैसे उसका जबाब मिल गया । उसने आसमान की ओर देखा फिर आँखें बंद कर मन ही मन भगवान का शुक्रिया किया कि कैसे आज फिर मेरी ही बेटी को मेरा गुरू बनाकर मुझे सही सीख दे दी आपने।जब तक जैसे को तैसा तरीका नहीं अपनाउंगी तब तक ऐसी समस्याएं बार-बार बनती ही रहेंगी ,। लातों के भूत बातों से भला कब मानते हैं !
वक़्त की टहनियों पे टंगे प्रेम के गुलाबी लम्हे
संदली ख़ुशबू का झीना आवरण ओढ़े
सजीव हो उठते हैं सूरज की पहली किरण के साथ ...
....
भाई कुलदीप जी का दिन बदल गया है
वे कल से रविवार की बजाए सोमवार को आया करेंगे
कल मिलिएगा कुलदीप जी से
जाते-जाते याद दिला दूं
पिछले सोमवार को एक शब्द दिया गया था
तिर्यक
कोई शायद समझ पाया
पढ़िए पूरी रचना
नील नयन, नील पलक;
नील वदन, नील झलक ।
नील-कमल-अमल-हास
केवल रवि-रजत भास
नील-नील आस-पास
वारिद नव-नील छलक ।
नील-नीर-पान-निरत,
जगती के जन अविरत,
नील नाल से आनत,
तिर्यक-अति-नील अलक ।
-सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
आराधना रागविराग
अगले रविवार को नया शब्द दूंगी
साथ ही दूँगी एक प्रसस्ति पत्र का नमूना
साथ ही दूँगी एक प्रसस्ति पत्र का नमूना
सादर



