हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...
वो मानव ही है जो
परीक्षाओं में निडर अड़ा है
घर अधिंयारा क्यों ?
फकीर बिगड़ा क्यों ?
अनार क्यों न चखा ?
वज़ीर क्यों न रखा ?
दीवार क्यों टूटी ?
राह क्यों लूटी ?
प्रश्नोत्तर ढूँढ़ रहा
छोड़ भले दें संगी साथी
अपने चाहे हो जाए पराये
हिम्मत कभी न हारो तुम
बढ़ते जाओ तुम अविराम !
–डॉ. सविता श्रीवास्तव
भीड़-भाड़ भरी इस दुनिया में, मैं अक्सर भटक जाता हूं l
भूल जाता हूं मंजिल इन तंग होती गलियों चौबारो में l
डर जाता हूँ पल-पल स्वरूप बदलते इन मील के पत्थरों से l
किसी अनजान मोड़ पर रोशनी को नुमायाँ करता एक दीया जला हैl
–राही ( Sandeep JR Bhati )
कहीं सबेरा कहीं अंधेरा
कहीं दिन कहीं रात होगी।
कहीं हर्षोल्लास कहीं पे
इंतेहान की बात होगी।
–जीकेश माँझी

