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शनिवार, 17 जुलाई 2021

3092... राही

 

हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...

वो मानव ही है जो

परीक्षाओं में निडर अड़ा है

घर अधिंयारा क्यों ?

फकीर बिगड़ा क्यों ?

अनार क्यों न चखा ?

वज़ीर क्यों न रखा ?

दीवार क्यों टूटी ?

राह क्यों लूटी ?

प्रश्नोत्तर ढूँढ़ रहा

राही

छोड़ भले दें संगी साथी

अपने चाहे हो जाए पराये

हिम्मत कभी न हारो तुम

बढ़ते जाओ तुम अविराम !

                             –डॉ. सविता श्रीवास्तव

मुझे रास्ता मिला है

भीड़-भाड़ भरी इस दुनिया में, मैं अक्सर भटक जाता हूं l

भूल जाता हूं मंजिल इन तंग होती गलियों चौबारो में l

डर जाता हूँ पल-पल स्वरूप बदलते इन मील के पत्थरों से l

किसी अनजान मोड़ पर रोशनी को नुमायाँ करता एक दीया जला हैl

              –राही ( Sandeep JR Bhati )

राही

कहीं सबेरा कहीं अंधेरा

कहीं दिन कहीं रात होगी।

कहीं हर्षोल्लास कहीं पे

इंतेहान की बात होगी।

                     –जीकेश माँझी

थी विकट परिस्थिति,और सघन था अंधकार,
जीवन में,
सब कुछ खो देने का डर था अंतर्मन में!
जब रवि ने भी मुँह मोड़ा,
परछाईं ने भी संग छोड़ा,
हर घनघोर कुहासे से निर्भीक लड़ा था वो ही!
स्याह अँधेरी रातों में भी साथ खड़ा था कोई!

                                                        –हेमन्त राय

गाता हुआ गाँव
बरगद की छाँव
किसान का हल
मेहनत का फल
चहकता हुआ पनघट
लम्बा लम्बा घूँघट

                 – अरुण जैमिनी (Arun Jaimini)



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पुन: भेंट होगी...
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