नमस्कार दोस्तो
जय आशापुरा मात की
प्रस्तुत है आज की लिंक
कहने को महिला दिवस, मना रहे सब आज।
मगर नारियों की यहाँ, रोज लुट रही लाज।१।
कुछ महिलाएँ हैं अभी, दुनिया से अनजान।
घर के बाहर है नहीं, जिनकी कुछ पहचान।२।
परिणय के पश्चात ही, मिल जाता उपनाम।
ढोना इस उपनाम को, अब तो उम्र तमाम।३।
आकांक्षा पर ....आशा सक्सेना
अतुलनीय गुणों की धनी
हर दिन उसका है
सब कुछ अधूरा जिसके बिना
फिर औपचारिकता क्यूं ?
हो एक दिवस उसके नाम
हुआ आवश्यक क्यूं ?
हर प्;ल रहती इर्दगिर्द
चाहे जो भी रूप धरे
माँ बहन बेटी होती
पत्नीकभी तो कभी प्रेयसी
सभी रूप होते आवश्यक
रेखा जोशी
आकांक्षा पर ....आशा सक्सेना
अतुलनीय गुणों की धनी
हर दिन उसका है
सब कुछ अधूरा जिसके बिना
फिर औपचारिकता क्यूं ?
हो एक दिवस उसके नाम
हुआ आवश्यक क्यूं ?
हर प्;ल रहती इर्दगिर्द
चाहे जो भी रूप धरे
माँ बहन बेटी होती
पत्नीकभी तो कभी प्रेयसी
सभी रूप होते आवश्यक
रेखा जोशी
यूँही सदियों से
चल रही पीछे पीछे
बन परछाई तेरी
अर्धांगिनी हूँ मै तुम्हारी
पर क्या
समझा है तुमने
बन पाई मै कभी
आधा हिस्सा तुम्हारा
बहुत सहन कर चुकी
अब मत बांधो मुझे
मत करो मजबूर
इतना कि तोड़ दूँ
सब बंधन
सबसे कम उम्र की ब्लॉगर : अक्षिता (पाखी) की चर्चा 'अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस' पर राजस्थान पत्रिका में 'मिलिए ब्लॉगिंग क्वीन्स से' के तहत..साथ में अक्षिता की मम्मी की भी चर्चा- "ब्लॉगिंग को दे रहीं नए मुकाम
ज्ञान दर्पण पर......रतन सिंह जी
हाल बता बुन्देल धरा तेरे उन वीर सपूतों का।
केशरिया कर निकल पड़े थे मान बचाने माता का।
Raja Jhujhar Singh Bundela जुझारसिंह बुन्देला ओरछा के राजा थे। अपने पिता वीरसिंह बुन्देला की मृत्यु के बाद ओरछा के राजा बने| ये गहरवाल वंश के थे| जुझारसिंह शासन का भार अपने पुत्र विक्रमाजीत को सौंप कर स्वयं शाहजहाँ की सेवा में आगरा चले आये। शाही दरबार में उसका मनसब चार हजार जात और चार हजार सवार का था। जुझार सिंह बुन्देला एक शक्तिशाली शासक थे। विक्रमाजीत ने वि.सं. १६८६ (ई.सन १६२९) में विद्रोह कर दिया। जुझारसिंह भी अपने पुत्र के पास चले गए। वहाँ अपने आप को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। शाहजहाँ ने विद्रोह को कुचलने के लिए एक विशाल शाही सेना भेजी।
और अब दिजिए
विरम सिंह सुरावा को आज्ञा
धन्यवाद
ज्ञान दर्पण पर......रतन सिंह जी
केशरिया कर निकल पड़े थे मान बचाने माता का।
Raja Jhujhar Singh Bundela जुझारसिंह बुन्देला ओरछा के राजा थे। अपने पिता वीरसिंह बुन्देला की मृत्यु के बाद ओरछा के राजा बने| ये गहरवाल वंश के थे| जुझारसिंह शासन का भार अपने पुत्र विक्रमाजीत को सौंप कर स्वयं शाहजहाँ की सेवा में आगरा चले आये। शाही दरबार में उसका मनसब चार हजार जात और चार हजार सवार का था। जुझार सिंह बुन्देला एक शक्तिशाली शासक थे। विक्रमाजीत ने वि.सं. १६८६ (ई.सन १६२९) में विद्रोह कर दिया। जुझारसिंह भी अपने पुत्र के पास चले गए। वहाँ अपने आप को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। शाहजहाँ ने विद्रोह को कुचलने के लिए एक विशाल शाही सेना भेजी।
और अब दिजिए
विरम सिंह सुरावा को आज्ञा
धन्यवाद


